जो आवाज, बिना ‘हत’ किये स्वतः ही सुनाई पड़े उसे अनाहत नाद कहते हैं। अनाहद या अनहद शब्द अनाहत का ही अपभ्रंश है। जब योगी वन में लीन हो जाता है तब ब्रह्म पथ के अन्दरूनी लोकों से उसे आवाजें सचाई देती हैं जिन्हें अनहद नाद कहा जाता है। उन्हें सुन योगी आनन्द में हो जाता है। अनहद नाद बड़ा अनूठा ज्ञान है जो हर व्यक्ति के अन्दर हर समय होता रहता है परन्तु गुरु कृपा के बिना इसे जाना नहीं जा सकता ।
अनहद शब्द को प्रगट करने के लिए आसन लगाकर पूर्व को मुँह करके एकान्त में ऐसे स्थान पर बैठना चाहिये जहाँ किसी प्रकार का शोर न हो । यदि भीड़भाड़ वाली जगह पर ही बैठना पडे तो समय ऐसा चुनना चाहिये जब वातावरण शान्त हो । ऊपर नीचे के जबडों (दांतों) को मिलाकर होंठ श्री मिलाकर मुँह बंद करना चाहिये। गर्दन को झुकाकर ठोड़ी को छाती पर लगावें तथा जिह्वा को उलट कर तालू पर लगावें, स्वास को नाक से लेकर, सुषुम्ना में चलाना चाहिये । हंस शब्द (जो गुरु ने बताया हो) को उलट-पलट कर प्राण के साथ मिलाकर, सुन्न में चलाना चाहिये । मुँह में जो लार (लब) आये उसे बाहर फेंकें, पीना नहीं चाहिये ।
चौबीसों घंटे ऐसा जाप हो सकता है। ऐसा अभ्यास करने से सुर्ति गगन में चढ़ती जाती है । याद रखना चाहिये कि बिना अभ्यास के नाद का साक्षात्कार नहीं हो सकता, इसलिए अनन्य मन से ध्यान लगाकर अभ्यास करना चाहिये । ऐसा करने से नाद की अनुभूति उत्तम साधक को एक सप्ताह में ही हो जाती है यदि देर लगती है तो एकाग्रता की कमी समझना तथा दृढ़ निश्चय रखकर अभ्यास करते जाना । योग्यतानुसार समय लेकर भगवद कृपा अवश्य ही होगी। शुरू में यह नाद मिली जुली आवाज में सुनाई देता है। बाद में अभ्यास बढने पर साफ-साफ अलग अलग दस प्रकार से प्रगट होता है।
1. चिन चिन टिड्डी तथा चिडियों की आवाज – इसे सुनकर रोमांच तथा कम्पन होने लगता है
2. झीगर या भुग जैसी आवाज– इसको सुनने से आलस्य तथा
तन्द्रा जैसी मस्ती का अनुभव होता है।
3. घंटी-घड़ियाल – इसे सुनने से भक्ति, ईश्वर प्रेम तथा उत्साह बढ़ता है।
4. शंख – यह नाद त्रिकूटी से आता है। त्रिकूटी से तालू में अमिरय टपकता है तथा चारों ओर से सुगन्ध आने लगती है।
5. वीणा, सितार – इस नाद को सुनकर बड़ा आनन्द आता है। ऐसा लगता है जैसे मौसम बहुत ही सुहावना हो गया हो ।
6. ताल, छेनें, झाँझ – सुन्न लोक से यह नाद ऐसा सुनाई देता है
जैसे अनगिनत झाँझ या थालियाँ एक साथ लय बद्ध होकर बज रही हों। इस नाद के सुनने से गले में एक प्रकार का पानी सा आता है।
7. बाँसुरी – इस धुन को सुनने से अन्तर्यामता आती है। योगी पूरे ब्रह्माण्ड को देख तथा सुन सकता है। वाक् सिद्धि आ जाती है जो कहे सत्य हो जाता है। इसे ब्रह्मज्ञान समझ कर भ्रम में न पड़ना चाहिये मंजिल अभी और आगे है।
8. मृदंग – इस नाद को सुनने से शरीर की समस्त बहत्तर हजार नाड़ियों का शोधन हो जाता है। जैसे मन्दिर में आरती के समय कई प्रकार की आवाजें आती हैं। इसी प्रकार की लीला सतगुरु के प्रताप से सुन्न लोक में होती है।
9. नफीरी – यह नाद बहुत अभ्यास के बाद सुनाई देता है। इसके सुनने से, गुप्त होने, प्रगट होने की शक्ति आ जाती है। योगी किसी भी रूप में कहीं भी तथा एक ही समय अनेकों स्थानों में प्रगट हो सकता है।
10. बादल की गरज – इसको सुनने से सुर्ति ज्योति में लौ लीन सी हो जाती है। सूर्ति के लौ लीन होने पर त्रिकूटी से झंझरी नाद प्रगट होता है जैसे बिल्लियाँ रोती हैं या घूरना जैसी आवाज आती है। इससे शरीर मस्त तथा बेकाबू हो जाता है। कभी-कभी उछल कूद भी स्वतः ही होने लगती है।
इन नादों को दाहिने कान से सुनना चाहिए। ब्रह्म पथ की यात्रा में ये नाद सहस्त्र दल से सतलोक तक ही सुनाई देते हैं। उसके बाद अलख अगम, अगोचर तथा अनामी लोकों में नाद गुप्त है।
नाद के साथ-साथ ब्रह्माण्डी लोकों के दृश्य भी प्रत्यक्ष होते हैं। दृश्य न दिखें तो नाद को फीका समझना चाहिये। जैसे टेलीविजन में या सिनेमा में तस्वीर न दिखे केवल आवाज ही आये तो तस्वीर के इशारे (एक्शन) को देखकर जो भाव मन में बनते हैं उसके अभाव में, न तो सही अर्थ ही लग पायेंगे, न ही पूरा आनन्द आयेगा। यहाँ तक कि लोग सिनेमा हॉल से उठकर चले जायेंगे। इसीलिए ज्योति से दृश्यों का होना भी जरूरी है।
ब्रह्म पथ में सहज समाधि ही सबसे ठीक है क्योंकि इसमें समस्त विश्व का दृश्य समाहित है। इसमें ज्योति तथा नाद दोनों स्वतः ही प्रगट हो जाते हैं। जिन लोगों को समाधि आसानी से नहीं सधती, वे अनहद नाद के सहारे सुर्ति को गगन में चढ़ा ज्योति को प्रगट करते हैं। ज्योति का ध्यान इन नादों से ऊपर है। तत्व वेत्ता संतजनों ने नाद ज्ञान को ज्योति प्रगट करने के लिए सामग्री मात्र बताया है तथा बिना ज्योति के नादों को फीका कहा है।
सहज समाधि के बारे में कबीर जी कहते हैं-
इस ब्रह्म विद्या को प्रगट करने की मेरे सतगुरु श्रद्धाराम तथा अन्य सभी ब्रह्मनिष्ठ सन्तों ने मनाही कर रखी है, इसलिए दास इससे ज्यादा कुछ भी कहने में असमर्थ है तथा इतना कहना भी सिर पर भार उठाना समझता है। साधकों के हित की बात ध्यान में आ जाने से कुछ अनुभव प्रगट हो गये हैं जिसके लिए अमर सिंह सभी तत्ववेत्ता सन्तों की चरण धूल, क्षमा को याचना करता है।