संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

आरती

आरती

प्रभुजी की आरती यह विध कीजे।

हृदय धोय निर्मल कर लीजे ।।

पहले अगम में अकल समोई, अनहद सबद शंख धुनि होई।।

सुन्न ध्यान धरो औंकारा, कर बिन झालर तत झंकारा।।

काया देवल आत्म देवा, सुरत लगाय साँच कर सेवा।।

ऐसी आरती गमन नसावे, बहुर जीव भव जल नहीं आवे ।।

आरती गावे जन पानप दासा, सहज मिटे साधो यम को त्रासा।।


पार-ब्रह्म जी की आरती कीजे, आतम खोज चरण चित्त दीजै ।।

पाँच तंत की बाती बनावे, मन दीपक मध्य जाय लगावे।।

ऐ गुण घृत सहज कर पूरे, सिरपे निर्मल जोति हजूरे ।।

हर जन आरती यह विध साजै, बिन ही मेघ गगन धुन गाजै ।।

कहै पानप संतन को दासा, ऐ विध पावे साधो चरण निवासा।।


साँची आरती प्रभुजी को प्यारी, जो जन करे सोई अधिकारी।।

सुरत गगन में आसन माँडे, साँसा सिंह सोई जन डाडे ।।

चहुँ दिस हीरा वर्षा होई, परखत रहे पारखी सोई।।

गगन थाल जहाँ रवि-ससि दोई, परम-ज्योति तहाँ दर्शन होई।।

मुरली सी ताल, तम्बुरा सो बाजै, कर बिन मुख बिन आरती साजै ।।

यह विध आरती करे जन कोई, कहे पानप जीवत मुक्ता होई।।

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