संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

आश्रम का उद्देश्य

आश्रम का उद्देश्य

संसार में सब दुःखों का कारण आत्म अज्ञान है और सब दुःखों से छुटकारा पाने की एकमात्र औषधि आत्मज्ञान ही है। ब्रह्मज्ञान के बिना मोक्ष नहीं मिलता। ब्रह्मा और आत्मा एक ही तत्व हैं।

ब्रह्मैवेदं सर्वम्, आत्मैवेदं सर्वम्!

अर्थात्— ब्रह्म ही यह समस्त जगत है और आत्मा ही यह समस्त सृष्टि है।

आत्मैव देवतास्सर्वाः, सर्वमात्मन्यवस्थितम्!

अर्थात्— सभी देवता आत्मस्वरूप हैं और संपूर्ण जगत आत्मा में ही स्थित है।

भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के छठे अध्याय, 29वें श्लोक में कहा है—

“जिसका अंतःकरण सम्यक्-दर्शन रूप योग से युक्त होकर ब्रह्मस्वरूप हो गया है, वह समस्त संसार के पदार्थों को देखते हुए अखंड सच्चिदानंद अद्वैत को ही लक्ष्य करता है। ऐसा योगी समस्त भूतों को आत्मा में और आत्मा को समस्त भूतों में देखता है।”

भगवती श्रुति ( वेद ) भी कहती है :-

सर्वभूतेषु चात्मानं , सर्वभूतानि चात्मनि !

संपश्यन् ब्रह्म परमं , यातानान्यंन्येन हेतुना !!

सार—सब भूतों में आत्मा को और आत्मा में सब भूतों को भलीभांति देखकर परब्रह्म (मोक्षपद) प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं। अर्थात्, आत्मानुभूति के बिना मोक्ष का और कोई साधन नहीं है।

उपर्युक्त महा ग्रंथों से सिद्ध होता है कि आत्मा और ब्रह्मा एक ही तत्व हैं। नाथ, आत्मबोध (ज्ञान) के बिना मोक्ष प्राप्ति नहीं होती।

यजुर्वेद कहता है :-

मनसैवानुद्रष्टव्यं, नेह नानास्ति किंचन !

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति !!

अर्थात् – “मन से ही देखना चाहिए; यहाँ कुछ भी भिन्नता नहीं है। जो व्यक्ति यहाँ विविधता को देखता है, वह मृत्यु के बाद मृत्यु को ही प्राप्त करता है।”

 

इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि यदि व्यक्ति संसार में विभिन्नता और भिन्नता को ही वास्तविकता मानता है, तो वह अंतिम सत्य या मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता। वास्तव में, आत्मा और ब्रह्मा एक ही तत्व हैं, और यह भिन्नता केवल मन की भ्रांतियों का परिणाम है। आत्मा की सच्ची दृष्टि प्राप्त करने के लिए, मन को इस भिन्नता से परे देखना चाहिए।

गुरु ग्रंथ साहिब का पहला श्लोक है – “ओंकार सतनाम करता पुरखु निरभौ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभंग गुरु प्रसादि॥”

अर्थात् “ओंकार (अक्षर) ही सत्य है, और उसका नाम सत है। वह कर्ता (स्रष्टा) है, पुरखा (प्राचीन और अनंत) है, निर्भय (अभीष्ट और भय रहित) है, निरवैर (द्वेषरहित) है, अकाल (नश्वरता से परे) है, मूर्ति (स्वरूप) है, अजूनी (जन्म-मृत्यु से परे) है, सैभंग (स्वयं सिद्ध) है, और गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है।”

इस श्लोक में ईश्वर के विभिन्न गुणों का वर्णन किया गया है। यह श्लोक ईश्वर को सत्य, अनंत, निर्भय, और स्वायत्त के रूप में प्रस्तुत करता है, और यह भी बताता है कि ईश्वर की अनुभूति और समझ गुरु की कृपा से होती है।

इस सर्वश्रेष्ठ साधना पद्धति को अपने ब्रह्मनिष्ठ गुरु संत श्रद्धाराम जी से उनके शिष्य अमर सिंह ने सीखा और युक्तिपूर्वक साधना कर आत्मानुभूति प्राप्त की। संत श्रद्धाराम ने आत्मबोध साधना आश्रम का निर्माण इसी उद्देश्य को लेकर किया गया है ताकि आत्मज्ञान कराने वाली यह साधना पद्धति जनसाधारण तक पहुंचाई जा सके और लोग इसका अनुसरण करके आत्मदर्शन कर मोक्ष प्राप्त कर सकें।

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