मेरी जन्म पत्री पचास वर्ष पहले बनी थी। मैंने अप्रैल 1993 में अपनी जन्म पत्री कई ज्योतिष के विद्वानों को दिखाई। सभी ने बताया कि 28 सितम्बर 1993 को भारी संकट है, सम्भवतः मौत हो सकती है, यदि संत-शरण मिले तो लम्बी उम्र पाओगे। मैं साधु-संतों की तलाश में घूमने लगा। मुझे गुरुजी के आश्रम में जाने के लिए पहले एक भटनागर नामक व्यक्ति ने कहा। फिर जब मेरी बहन पर कालीमाता की चौकी आई हुई थी, तब चौकी में माता ने कहा, “सुमन बूढपुर गाँव चले जाओ, तुम्हारा कल्याण हो जायेगा।” जुलाई 1993 को में गुरुजी के आश्रम आया। मैंने गुरुजी से पूछा, “5 दिसम्बर 1993 को हमारे शम्भूदयाल स्कूल में चेयरमैन पोस्ट के लिए चुनाव हो रहा है, क्या मैं चुना जाऊँगा?” गुरुजी ने जबाव दिया 28 सितम्बर 1993 के बाद यदि जीता रहा तो चेयरमैन जरूर बन जाएगा । गुरुजी का उत्तर सुनकर मैंने कहा, “मैं जरूर जीऊँगा और चेयरमैन भी बनूंगा क्योंकि जिस संत की मुझे तलाश थी, वह मिल गया।” इस पर गुरुजी ने कहा, “हमारे भरोसे न रहना, कहीं और सन्त महात्माओं की तलाश करो। मौत जैसे संकट को टालना बच्चों का खेल नहीं हैं।” फिर मैंने गुरुजी को अपनी जन्मपत्री की कॉपी दिखाकर अपनी कहानी बताई। 1 सितम्बर 1993 को पूर्णमासी के दिन मैं आश्रम में आया। गुरुजी ने मुझे आवाज देकर बुलाया और कहा “हमने परमात्मा से प्रार्थना की थी, उन्होंने तेरी दरखास्त मंजूर कर ली है। अब तू ठाट से जीयेगा भी और चेयरमैन भी बनेगा।” 28 सितम्बर 1993 को मेरे ऊपर भारी संकट तो आया, मगर गुरुजी के आशीर्वाद से मैं बिल्कुल सुरक्षित रहा और 5 दिसम्बर को चुनाव जीतकर चेयरमैन भी बन गया।
सुमनसिंह शर्मा
गढ़ी ब्रहमना, जिला-सोनीपत
मैं राजेश, एक दिन मैंने गुरुजी से कहा कि मैं कल शाम को वैष्णों देवी जा रहा हूँ। गुरुजी ने कहा “अरे भाई छोड़, माता के दर्शन हम तुझे यहीं करवा देते हैं।” मैंने कहा, गुरुजी हमने पूरी बस रिजर्व की हुई है, मेरे कई मित्र भी जा रहे है। गुरुजी ने कहा, “अरे क्यों मुसीबत मोल लेता है। यदि दर्शन ही करने हैं, तो यहीं करवा देता हूँ।” गुरुजी के बार-बार मना करने पर भी मैं वैष्णों देवी चला गया। वापसी पर बारिश और चट्टान खिसकने के कारण हमारी बस उलटने लगी। मैंने आँखे बंद करके गुरुजी से प्रार्थना की, ‘गुरुजी मुझे बचाओ’, उसके बाद मुझे होश ही न रहा । जब आँख खुली तो देखा बस एक वृक्ष के साथ अटकी है। उसी दिन प्रातः 11 बजे मेरी माँ प्रभा, गुरुजी से मिलने आश्रम गई तो गुरुजी ने उसे कहा, “देखो राजेश मना करने पर भी वैष्णों देवी चला गया और उसे मौत से बचाने के लिए हमें मुसीबत उठानी पड़ी। अपने हाथों से बस को उलटने से रोका और एक वृक्ष के साथ अटका दिया है। हमारे हाथ अभी तक दर्द कर रहे हैं।” उन्होंने मेरी माँ को पूरी बात बताई। जब मैं रात को घर आया, तो माँ ने मुझे गुरुजी द्वारा कही गई बातें बताई। मैंने कहा कि मेरे साथ बिल्कुल ऐसा ही हुआ है। मैं अपनी माता के साथ गुरुजी का शुक्रिया करने आश्रम आया हूँ क्योंकि उन्होंने मेरी जान बचाई है।
राजेश
मकान नं0-WZ-73,
गली नं0-2-श्रीनगर
रानी बाग-दिल्ली-34
मैं शीतल प्रसाद, अपनी बीमार 29 वर्षीय पुत्री गीता को लेकर गुरुजी के आश्रम में आया। गीता की हालत उस समय बड़ी दयनीय थी। उसके सिर, कान, पेट, गर्दन, दाँत, तथा छाती में भयंकर दर्द रहता था । उससे खड़ा नहीं हुआ जाता था । वजन भी सिर्फ 26 किलो रह गया था। इससे पहले उसका बहुत से सरकारी तथा प्राइवेट अस्पतालों में इलाज हो चुका था। आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथिक आदि सभी तरह के इलाज करवाने के बावजूद उसे आराम नहीं आया। जादू-टोना, टोटका, भूतप्रेत तथा ग्रह शान्ति के उपाय भी कराए मगर बच्ची ठीक नहीं हो रही थी। सबको लगता था बच्च्ची नही बचेगी । गुरुजी उसकी दोनो कनपटियों में अपने हाथ की छोटी उंगली रखकर उसके शरीर में अपनी शक्ति द्वारा चेतना का संचार करते थे तथा उसे पीने के लिए टॉनिक भी देते थे। इससे उसे चमत्कारिक लाभ होता गया। अब वह बिल्कुल स्वस्थ है।
शीतल प्रसाद
169 सुखदेव बिहार, नई दिल्ली