संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

जीव-प्रकृति-ब्रह्म विज्ञान

आरम्भ में पूर्ण ब्रह्म में इच्छा हुई कि मैं एक हैं. अनेक हो जाऊँ। क्षण उसके स्वरूप में से एक अद्भुत ज्योति-तरंग उत्पन्न हुई जिसे प्रक्ति कहते है. यही संसार की रचना करती है। वही पूर्णब्रह्म अपने परि अंश रूप से तथा प्रकृति के संयोग से जीवात्मा बनी । मूल प्रकृति महत्तत्व उत्पन्न किया जिससे त्रिगुणी अहम् उत्पन्न हुआ। अहम् ने महर से मिलकर क्रमशः पंच महाभूत-आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी उत्पन्न किया। तेज समूह के विकत होने पर मन तथा उसके आधीन दमो इन्द्रियों को प्रगट किया, फिर महातत्व ने पंचमहाभूतों के विकार-शब्द स्पर्श, रूप, रस, गंध को अपने में विकार रूप से धारण करके तथा बा ज्योति से चेतना पाकर सब तत्वों को एक रूप कर एक अण्डा पैदा किया। यही हिरण्यगर्भ है, जिसमें पूरा संसार स्थित है
परमतत्व यह आत्मा ही अंशरूप से मायावश जीव बनी है। इसमें गीर करने से पता चलता है कि वह आत्मा या परमात्मा ही नाना रूपों में स्वयं ही लीला खेल रहा है उसके सिवाय कुछ भी नहीं है। इसलिए वेद कहता है “एको ब्रह्म द्वितीयो न अस्तीः”
प्रकृति परा और अपरा दो रूपों वाली है। चेतन रूप परा प्रकृति बड़ी अनोखी है जो अपने नियमानुसार संसार को धारण किये है। सभी नियम जगत के अनुकूल हैं, विरुद्ध कुछ भी नहीं है । प्रकृति-नियम को ईश्वा इच्छा ही समझो । इसी में परा अपरा दोनों रूपों से प्रकृति जगत को उत्पन तथा प्रलय करती है और इस प्रकृति चक्र को स्वयं ईश्वर ही चलाता है। यह प्रकृति अनादि है लेकिन इससे बने आकार विनाशी हैं। आकार नष्ट होने पर इसके तत्व अपने मूल तत्व में समा जाते हैं। यह प्रकृक्ति बार-बार अनेकों रूप धारण करती है तथा प्रलय होने पर ब्रह्म ज्योति में लय हो जाती है।

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