आत्मअनुभूति के लिए गुरु की जरूरत उतनी ही है जितनी जीवित रहने के लिए प्राणों की जरूरत है। गुरु के बिना आत्मज्ञान नहीं होता और आत्मज्ञान के बिना मोक्ष नहीं होता । गुरु ऐसा होना चाहिये जो वेद को अनुभव से जानता हो। केवल पढ़ कर जान लेने वाला मोक्ष प्राप्ति में किसी काम का नहीं। जैसा वेद शास्त्र पढ़ा सुना वैसा अनुभव से सत्य को पाया हुआ ही वास्तविक गुरु है। ऐसा गुरु ही ब्रह्मनिष्ठ होता है । ब्रह्म समझ की सतत् धारणा जिसकी बनी रहे, यानि, “मैं ब्रह्म हूँ”, ऐसी जिसकी सत्य धारणा बनी रहे, वही ब्रह्मनिष्ठ होता है।
ऐसा गुरु चैतन्य मन्त्र विज्ञाता होता है। जिसने मंत्र द्वारा अपनी अन्तःशक्ति को जगा कर चेतन बना लिया होता है। वही दूसरों को मंत्र देकर उनकी शक्ति को भी चेतन बना देता है। वह कुण्डलिनी को भेद कर चेतन बना क्रियाशील कर देता है। वह मंत्र के लक्ष्य को विधिवत् जानता है। भगवान श्री राम चन्द्र जी को उपदेश देते हुए उनके गुरु श्री वशिष्ट मुनि कहते हैं, “जो संकल्प, दृष्टि, स्पर्श या मन्त्र दीक्षा द्वारा शिष्य को परम तत्व की अभेदानुभूति करा दे, वही गुरु है।”
दर्शनात् स्पर्शनात् शब्दात् कृपया शिष्य देह के । जनयेद्यः समावेशं शांभवं स हि देशिक : ॥
(निर्वाण प्रकरण योग वशिष्ट)
वह बाहर देखता हुआ भी अन्तः लक्ष्य रखता है। वह त्रिकाल दर्शी तथा शक्ति को घटाने बढ़ाने में समर्थ होता है। वह इन्द्रीय जीत, सत्यबोध ज्ञाता, बुद्धिवाला, अनन्त शक्तिशाली, धीर, कृपालु सबसे प्रेम करने वाला, हास्यपूर्ण, सुखद वाणी वाला होता है। जब गुरु अपने शिष्य को गुरु बनाता है तो उसमें अपनी पूर्ण शक्ति डाल देता है। ऐसे गुरु के पीछे महान तपस्या की शक्ति का दिव्य भंडार होता है। उस की संगत से तुरन्त अनुभव सम्भव है। जैसे भृंगी कीड़े को बदल कर भृंगी बना देता है, वैसे ही जो गुरु शिष्य की अन्दर से काया पलटकर अपने समान ब्रह्मनिष्ठ बना ले वही गुरु है। गुर व्यक्ति या देह नहीं है. वह तो शक्ति है। गुरु जगत में व्याप्त परम तत् ज्ञान की पराकाष्ठा, भव रोग निवारक तथा आत्मज्ञान कराने वाला है। आत्मज्ञान का मूल ध्यान है और जो ध्यान की गहराई में उतार दे, वही गुरु है।
गुरु तत्व एक महान शक्ति होती है जिसके कारण गुरु को भगवान श्री रामचन्द्र तथा श्री कृष्णचन्द्र ने भी पूजा । गुरु, अपने गुरु तत्व से अपने शरीर से ऊपर उठकर अपनी रहनी सहस्त्रासार में रखता है तथा वह जीव भाव में कभी भी नहीं रहता । पूर्णगुरु मुक्त होते हैं और अपने शिष्य को भी मुक्त करते हैं। पाखण्डी गुरु शिष्य को गुलाम बना कर उसका शोषण करते हैं। कहा है है- –
शिष्य को ऐसा चाहिये गुरु को सबकुछ दे । गुरु को ऐसा चाहिये शिष्य से कुछ न लें ॥
मतलब बहुत गहरा है, जब शिष्य सब कुछ गुरु को दे देता है तो उसकी खुदी मिट जाती है और खुदी मिटने पर ही आत्मभाव प्रगट होता है अन्यथा नहीं। गुरु कुछ न ले का अर्थ है कि गुरु को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है. इच्छा नहीं है। जो शिष्य से लेने की इच्छा करता है वह माया में ही जी रहा है तथा जीव ही है। उसमें गुरु तत्व नहीं है। इसलिए असली गुरु नहीं है। गुरु खूब परख कर के ही बनाना चाहिये। कबीर जी कहते हैं –
कन फूंका गुरु हद का, बेहद का गुरु और। बेहद का गुरु जब मिले, पहुँचा देवे ठौर ॥
गुरु हमें मार्ग दिखाते हैं तथा हमारे तैयार होने पर सत्य का अनुभव करा देते हैं। गुरु जहाँ कहीं भी हों इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । हमें अपने आप को खाली रखना है ताकि जो कुछ भी गुरु हमारे अन्दर डालना चाहें, डाल दें और हम ग्रहण कर सकें