धारणा, ध्यान, समाधि तीनों मिलकर संयम कहलाते हैं। ये सभी सबीज समाधि के अन्तरंग साधन हैं किन्तु निर्बीज समाधि के लिए ये साधन भी बहिरंग ही हैं। इनके संयम विनियोग से कई प्रकार की शक्तियाँ (ऋद्धि सिद्धि) प्राप्त हो जाती हैं। ये सिद्धियाँ यद्यपि अश्रद्धालु लोगों की योग में श्रद्धा बढाने और विक्षिप्त चित्त वालों के मन को एकाग्र करने में सहायक होती हैं किन्तु इनमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये वरना ये महापतन का कारण बन जाती हैं। इसीलिए सभी संत महात्माओं ने इन सिद्धियों का दुरुपयोग न करने का उपदेश दिया है। योगशास्त्र के विभूतिपाद में भी चेतावनी दी गई है कि योगी को नाना प्रकार के प्रलोभन आते हैं, योगी को उनसे बचना चाहिये। उनमें फँसने से और घमंड से बचे रहना चाहिये। इन सिद्धियों से भी वैराग्य होने पर तथा सभी दोषों का बीज क्षय होने पर ही मोक्ष मिलता है।
योगी के नित्य जीवनचर्या के कार्य करने में ही कभी-कभी ये शक्तियाँ चमत्कार कर देती हैं, जब कि योगी इनसे अनासक्त ही रहता है। संत महात्मा चमत्कार दिखा कर संसारी लोगों को प्रभावित करने के लिये ऋद्धि-सिद्धियों का प्रयोग नहीं करते। वे तो सहज स्वभाव में रहते हैं। करुणा से या लीला-वश उनके द्वारा चमत्कार स्वतः ही हो जाते हैं। यह जरूरी नहीं है कि किसी एक का कोई कष्ट चमत्कारी रूप से दूर कर दिया तो उसी प्रकार का कष्ट अन्य सभी लोगों का दूर कर दिया जाये । यह तो भक्त की भावना तथा महापुरुषों की करुणा पर निर्भर करता है। यदि भक्त की भावना महापुरुषों को प्रसन्न कर उनमें करुणा पैदा कर दे तो उन पर भी वैसा ही चमत्कार हो सकता है।
इस नियमानुसार इस आश्रम में ऐसे चमत्कार होते ही रहते हैं। सर्वाइकल स्पौंडिलाइटिस में चक्कर आना, तीव्र पीड़ा होना, गर्दन का न हिलना आदि शिकायतें, अधरंग में मुँह का टेढ़ा होना, आवाज साफ न निकलना या बिल्कुल न निकलना, मुँह से पानी निकल जाना, खाना गले में अटकना, लार गिरते रहना आदि समस्या, फ्रोजन शोल्डर में हाथ का ऊपर या पीछे न जाना तथा अन्य प्रकार के दर्द यहाँ तुरन्त ही ठीक हो जाते हैं। कभी-कभी संसार में कहीं से भी रोगी से टेलीफोन पर बात होने या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा रोगी के बारे में प्रार्थना करने मात्र से ही दर्द तथा अन्य रोगों में यहीं आश्रम में बैठे-बैठे राहत पहुँचा दी जाती है।