ना खोजे मूर्ख अज्ञानी, वो तो प्रेम रतन की खानी ।।
गृह तज बन खंड जाई, और कंद-मूल-फल खाई।।
जप-तप कर देह जरावै, हरि-हीरा हाथ न आवे ।।
करे तीर्थ व्रत घनेरे, वसूधा परिकरमा फेरे।।
यों ही भ्रम में जन्म गवावै, हरि हीरा कहीं न पावै ।।
पंडित पढ़े पुस्तक पोथी, ये सब प्रेम बिना है थोती ।।
पढ़े गीता और भागवत, बिन दरसन मुक्ति न होत ।।
ब्रह्म अरूप अन्तर रहा, बाहर, पाहन सेया।
पाहन सेती परचा लिया, पानप जन्म अकारथ खोया ।।
कहै पानप जग अंध न सूझे. पार-ब्रह्म घट माहिं।
पाहन पार-ब्रह्म कर पूजे, यह क्यों न नरक को जाहिं।।
आत्म तज पाहन को पूजे, यो भ्रम भक्ति है धोखा।
आत्म सेवो सुरतसूं पानप, ताको दरसन अलख अनोखा ।।
ब्रह्मा-विष्णु-महेस के, सब जग रहा भरोसे।
जा दरसन को सन्त जतावें, वह दरसन उन्हे न होसे ।।
गुण तिरगुण तिहुँ लोक में, ब्रह्मा विष्णु महेस ।
संत बसें वहाँ पानपा, अगम में चौथा देस ।।
चारों वेद बूझे जो कोई, कहाँ राम का बासा।
राम ही राम कहै सब कोई, सहै काल की त्रासा।।
प्रगट है परमात्मा, वेद न जाने भेद।
कहै पानप सब नर्क को जाई, बिन देखे वस्तू अभेद ।।
आत्म भेद अभेद खोज के, पार-ब्रह्म गह लिया।
कहै पानप जब सुरत विचारी, हरि निज दर्शन दिया।।
चारों वेद जाल धीमर का, जीव फँसा तामें सारा।
कहै पानप सतगुरु बिना, कौन छूटा वन हारा ।।
सूझ पड़े सतसंग ते वेद कतेबा दूर।
आत्म खोजे पानपा सर्व रहयो भरपूर ।।
किसको ढूंढ़े, किसको पूजे, हरि हृदय के बीच।
हृदय खोजे सुर्ति सूं पानप, लई सतगुरु की सीख ।।
एक तजे अनगिन भजे, सो नारी बेसवा जान।
वह पति की कैसे भई, पति को ना पतियान।।
मनसा दौडी फिरत है कहै जिहवाएँ राम।
कहे पानप नहचे कर जाना, कुछ ना सरै काम।।
जो चाहै अपना भला, तज सोवन की बान।
तेरे सिर पे पानपा, गह रहो काल कमान।।
पेट भरे सो नींद सतावे, पेट भरे बैठन नहीं पावै ।
पेट भरे पर जो नर सोया, तिस ने अपना सरबस खोया ।।
सुमरन सहित जागना सच्चा, बिन मुख जिह्वा नाम।
सुर्त संग ले जागे पानप, तापे मैं बलि जाँव।।
मरने माँहि अधिक सुख, जो मर जाने कोय।
सुरत बाँध अंतर धर पानप, परम सुखी सोई होय।।
जो चाहे जीवत मरा, तो जगसूँ सूरत सुलझावें।
कहै पानप बचे यम त्राम सूं, जब मन में उलट बसावे ।।
गरज हमारी एक सूँ, और दूजे से नाहीं।
जासू हमारी गरज है पानप, सो हमारे घट माहीं ।।
घट खोजे आत्म सेवे, सो हरि सरन आया।
मनसा लाग कहे जन पानप, हरि दरस दिखाया।।
संतो घट में हरी लहया, सतगुरु शब्द विचार।
कहै पानप प्रगट आत्मा, सुरतसू लई समभार।।
हरि नाम का आसरा, वाही सो प्रतीत ।
कहै पानप मैं घट में देखा, तजी जगत की रीत।।
पूजूं तो परमात्मा, दूजा पूजूँ काहि।
सतगुरु सेती सूझ पड़ी है, सुरत धरूँ मन माहि।।
विश्व रूप परमात्मा, रहा सकल जग माहि।
बिन सतगुरु पानप कहै. पावे कोई नाहिं ।।
खोजी मिले तो निकट है भ्रम पड़े को दूर।
आत्म सेव सुरत से पानप, आठो पहर हजूर।।
पानप आत्म पूर बसा, जगस् सुरत सुलझाय।
अपने मन को खोज के मन ही माहि समाय।।
रूप अरूपी राम हमारो, रूप अरूपी राम।
देह धरे जो राम कहावै, तांसु न मेरो काम।।
बिनसनहार देह धर आयो, साहब केह विधि कहिए।
साहब को दूजा कर जानें, तो नरक कुण्ड में गइँए।।
खौजी खोजे, खोज तब पायो, व्याप रहयो सर्व माहिं।
निपट निकट हरजन को जानें, ताकों सीस नवाँहि।।
आँख खोल के देख ले, आगे खड़ा अलेख।
कहे पानप पावे अकल सूँ, ताके रूप ना रेख।।
दो नेत्र बीच नासिका, जहाँ सरोवर मान।
सुरत सहित चढ़े जीवड़ा, जन पानप करे बखान।।
कहै पानप आँख खुलते ही, सब पेखने पेखेगा।
आँख खोल न सका, तो आँख मूंद क्या देखेगा।।