संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

पानप देव जी की वाणी

पानप देव जी की वाणी

अपना आप करे प्रकाश, अपना आप कहावे दास।
अपनी महिमा आप ही करे, जन के शीश बड़ाई धरै ।।
पानप दास शब्द प्रकाश, गुरु गम पाये चरण निवास।।

भ्रम

ना खोजे मूर्ख अज्ञानी, वो तो प्रेम रतन की खानी ।।
गृह तज बन खंड जाई, और कंद-मूल-फल खाई।।
जप-तप कर देह जरावै, हरि-हीरा हाथ न आवे ।।
करे तीर्थ व्रत घनेरे, वसूधा परिकरमा फेरे।।
यों ही भ्रम में जन्म गवावै, हरि हीरा कहीं न पावै ।।
पंडित पढ़े पुस्तक पोथी, ये सब प्रेम बिना है थोती ।।
पढ़े गीता और भागवत, बिन दरसन मुक्ति न होत ।।
ब्रह्म अरूप अन्तर रहा, बाहर, पाहन सेया।
पाहन सेती परचा लिया, पानप जन्म अकारथ खोया ।।
कहै पानप जग अंध न सूझे. पार-ब्रह्म घट माहिं।
पाहन पार-ब्रह्म कर पूजे, यह क्यों न नरक को जाहिं।।
आत्म तज पाहन को पूजे, यो भ्रम भक्ति है धोखा।
आत्म सेवो सुरतसूं पानप, ताको दरसन अलख अनोखा ।।
ब्रह्मा-विष्णु-महेस के, सब जग रहा भरोसे।
जा दरसन को सन्त जतावें, वह दरसन उन्हे न होसे ।।
गुण तिरगुण तिहुँ लोक में, ब्रह्मा विष्णु महेस ।
संत बसें वहाँ पानपा, अगम में चौथा देस ।।
चारों वेद बूझे जो कोई, कहाँ राम का बासा।
राम ही राम कहै सब कोई, सहै काल की त्रासा।।
प्रगट है परमात्मा, वेद न जाने भेद।
कहै पानप सब नर्क को जाई, बिन देखे वस्तू अभेद ।।
आत्म भेद अभेद खोज के, पार-ब्रह्म गह लिया।
कहै पानप जब सुरत विचारी, हरि निज दर्शन दिया।।
चारों वेद जाल धीमर का, जीव फँसा तामें सारा।
कहै पानप सतगुरु बिना, कौन छूटा वन हारा ।।
सूझ पड़े सतसंग ते वेद कतेबा दूर।
आत्म खोजे पानपा सर्व रहयो भरपूर ।।
किसको ढूंढ़े, किसको पूजे, हरि हृदय के बीच।
हृदय खोजे सुर्ति सूं पानप, लई सतगुरु की सीख ।।
एक तजे अनगिन भजे, सो नारी बेसवा जान।
वह पति की कैसे भई, पति को ना पतियान।।
मनसा दौडी फिरत है कहै जिहवाएँ राम।
कहे पानप नहचे कर जाना, कुछ ना सरै काम।।
जो चाहै अपना भला, तज सोवन की बान।
तेरे सिर पे पानपा, गह रहो काल कमान।।
पेट भरे सो नींद सतावे, पेट भरे बैठन नहीं पावै ।
पेट भरे पर जो नर सोया, तिस ने अपना सरबस खोया ।।
सुमरन सहित जागना सच्चा, बिन मुख जिह्वा नाम।
सुर्त संग ले जागे पानप, तापे मैं बलि जाँव।।
मरने माँहि अधिक सुख, जो मर जाने कोय।
सुरत बाँध अंतर धर पानप, परम सुखी सोई होय।।
जो चाहे जीवत मरा, तो जगसूँ सूरत सुलझावें।
कहै पानप बचे यम त्राम सूं, जब मन में उलट बसावे ।।
गरज हमारी एक सूँ, और दूजे से नाहीं।
जासू हमारी गरज है पानप, सो हमारे घट माहीं ।।
घट खोजे आत्म सेवे, सो हरि सरन आया।
मनसा लाग कहे जन पानप, हरि दरस दिखाया।।
संतो घट में हरी लहया, सतगुरु शब्द विचार।
कहै पानप प्रगट आत्मा, सुरतसू लई समभार।।
हरि नाम का आसरा, वाही सो प्रतीत ।
कहै पानप मैं घट में देखा, तजी जगत की रीत।।
पूजूं तो परमात्मा, दूजा पूजूँ काहि।
सतगुरु सेती सूझ पड़ी है, सुरत धरूँ मन माहि।।
विश्व रूप परमात्मा, रहा सकल जग माहि।
बिन सतगुरु पानप कहै. पावे कोई नाहिं ।।
खोजी मिले तो निकट है भ्रम पड़े को दूर।
आत्म सेव सुरत से पानप, आठो पहर हजूर।।
पानप आत्म पूर बसा, जगस् सुरत सुलझाय।
अपने मन को खोज के मन ही माहि समाय।।
रूप अरूपी राम हमारो, रूप अरूपी राम।
देह धरे जो राम कहावै, तांसु न मेरो काम।।
बिनसनहार देह धर आयो, साहब केह विधि कहिए।
साहब को दूजा कर जानें, तो नरक कुण्ड में गइँए।।
खौजी खोजे, खोज तब पायो, व्याप रहयो सर्व माहिं।
निपट निकट हरजन को जानें, ताकों सीस नवाँहि।।
आँख खोल के देख ले, आगे खड़ा अलेख।
कहे पानप पावे अकल सूँ, ताके रूप ना रेख।।
दो नेत्र बीच नासिका, जहाँ सरोवर मान।
सुरत सहित चढ़े जीवड़ा, जन पानप करे बखान।।
कहै पानप आँख खुलते ही, सब पेखने पेखेगा।
आँख खोल न सका, तो आँख मूंद क्या देखेगा।।

चेतावनी

अपना मन समझाया नहीं, चेले किये घनेरे।
कहे पानप शब्द विचारा नाँही, ए पड़े काल के घेरे।।
कहै पानप धोखा खायेगा, जो औरे धोखा देह।
अपना राम चीन्हा नहीं घट में, और चिन्हावै केह।।
चेले कर भाई चेलेकर, नरक न पड़ता तो नरक में पड़।।
चेले गुरु मता नहीं पाया।
घट में हरिका दर्श गवाँया।।
दर्शन बिन जग अहला आई।
चेले गुरु ठौर नहीं पाई।।
चेले का घर बसे अगाध।
गुरु करता डोले बकबाद।।
सुरत गुरु और मन है चेला।
ताका सुपनै नाँहि मेला ।।

गुरु-संगत

गुरु परमेश्वर एको जान, गुरु मिल प्रभु की पड़ी पहचान।
जन्म-जन्म कू तिमिर मिटाया, तन में मन निर्मल दिखलाया।।
गुरु कृपा सूँ वह पद पाया, घट में आत्म प्रगट लखाया।
गुरु की महिमा कही न जाई, गुरु परमेश्वर एको भाई।
भरमी गुरु के निकट न जाई, आप बहैं चेले दिए बहाई ।।
कहे पानप गुरु पे कुरबान, जिनसूँ पाया साधो पद निर्वाण ।।
भक्ति अगोचर जगत सूँ, बिन पाय सतसंग।
संत मिले बड़ भाग सूँ, तब लागै नाम सूँ रंग।।
ऐसा संत कौन विधि पावै, भेष साधु कहै-कहै बौरावै।
हरि के जन तिनकी गति न्यारी, सूर पूरवला पावै संस्कारी।।
जग में बड़ी संत की महिमा, नाम रतें कहिये नेक करमा।
उनमुनि दसा उदास रहै, अनुभव बानी मुखसूँ कहै।।
मन थीर किया पलक नहीं चले, हरि चर्णों ते छिन नहीं टले ।।
स्वाँस-स्वाँस चलत है छीना, दरसन सहित थकित तिन कीना।।
पागी प्रेम पलक नहीं लागै, निसवासर सोवै न जागें।।
ऐसा संत मिले जो कोइ, भागे भ्रम पूर्ण मति होई।।
पहले चिन्ह ऐसा लख लीजे, ता हरजन की सेवा कीजे ॥
नयन बहै नीर की धारा, घट में निरखे तत् अपारा।।
वह संस्कारी संत है और सकल संसार।
ऊहै पानप जग का मता तजो इनका संग निवारि।।
आदि अन्त की साख योह, कर लीजो सतसंग
संत मिले पानप कहै तब लागे नाम से रंग।।
सर्व निवासी रहें निकट ही आपा रहे लुकाय।
कहै पानप सतसंग मिले, जब कुछ जानी जाय।।
मन में धून लागी रहे तिनकी संगत कीजे।
कहै पानप पत्थर मत मेरी, सतसंग मिले तो भीजे ।।
इनकी संगत कीजिये, तन-मन स्थिर होय।
आप तरे पानप कहै और तिरावें सोय।।
संगत सत से होय फल, जिन किन संगत कीन।
कीट से भंग भया, कहै पानप लौ-लीन।।
खेंच सुरत जो मन में लावैं, सो जन हरिका दर्शन पावैं ।।
दर्शन किये होय मन थीरा ता संगत थिर होय सरीरा।।
मन में सुमिरन ना करें, मुख सूँ करे बकवाद।
पानप कहै सुनो भाई साधो, उनका संगत त्याग।।
जा संगत सूँ सोय पलटे, वह संगत कुछ और।
ऐ सब संसारी संगत पानप, यम नहीं छोड़े कोय।।

सिमरन-जाप

केते भजन करें मालासूँ, केते मुख सूँ कहे राम।
जब लग भजे न सुरत मन, कहै पानप सरै न काम।।
कर सूं माला पटक दें, हृदय-सुरत सम्भाल।
कहै पानप ऐसी जुगत उपावे, तो काहे व्यापै काल ।।
जैसे माला कर में फेरे, ऐसे मन फेरे मन माहि।
कहै पानप हर हाजिर तासूँ, एक पल बिछड़े नाहि।।
अजपा जपे बिना मुख माला, यो समरै हरिपावे।
पानप कहे भरम में समरे, राम हाथ नहीं आवै।।
घर के आंगन आवै-जावै द्वादस अंगुल माला।
कहे पानप भजते मुक्ता होई है कोई फेरन वाला।।
द्वादस अंगुल माला है कोई संत सयाना फेरे।
कहे पानप संसार न माने, संत कहत है टेरे।।
द्वादस अंगुल माला है फेरै, अजर-अमर घर पावै।
कहै पानप बिन जिह्वा सुमिरे, सुन्न मंडल लौ लावै।।
जाकी सुन्न मंडल लौ लागी, दर्शन भया प्रकासा।
कहै पानप अलख अरूप दरसाया, मिट गई यम की त्रासा।।
पाँच तत्त की डोरी करके, मनका मणिया पोवै।
सहज सुमरन होये सूरत सूँ, कहे पानप मुक्ता होवै।।
सुमरन हाथ जिभ्या नहीं रोके, ऐसा सुमरन सार।
सुमरन कीजे सुरत सुँ, हाथ जिभ्या करे कार।।
मुख सुँ कहै सो थोतरा, अन्तर धरे सो सार।
बिन जिह्वा पानप कहे, हर-हर नाम उचार।।
सुरत करै रंकार धुन, नहीं जिह्वा का काम।
पानप कहे सुनो भई साधो, यह विध सुमरो राम।।
अजपा सोई सुरत सूँ सुमरै, मुख सूँ कहना नाहि।
अंतर धुन राचा रहे, कहे पानप मुक्ति समाई ।।
माला जपू न कर जपू, मुख से कहूँ न राम।
सतगुर अंतर ठांव बताई, तहाँ रटू अष्टयाम ।।
अष्टयाम वहाँ रहूँ, जहाँ दो पर्वत की संध।
वहाँ आसन चढ़ पानपा, होत सदा आनन्द ।।
हर जन ऐसी युक्ति उपावे, चंदा सूर एक घर लावे।।
पानप शब्द करो विचारा, समझत होवे भव जल पारा।।
अनहद धुन सुनत रहूँ बिन काना।
योही समझ है मूल भक्ति को, ना जिभ्या से कहना।।
सोधे नाथ निरतसू अंतर, सुरत गगन को ताना।
सुरत गगन चढ़ अनहद बाजे, कोई सुने संत सुजाना।।
मंडल आकाश अंध मुख कुँआ, चूए अमी रस धारा।
पिवे योग युक्त का योगी, चहुँ दिस भया उजारा।।
पिवत अमी जन भया मदमाता, अनुभव बानी गावे।
गूंगे ने गुड़ खाय बखाना, सैन कोई जन पावे।।
आवे जाय मरे न जीवे, गुरु खोजी खोजा।
आवत जात अगम समावै, ताको त्रिभुवन सूझा।।
कहै पानप सुनो भई साधो, यह विधि किस तू कहिये।।
साँच कहै सब जग खीजे, समझ चुप ही रहिये।।
सोहं सोहं स्वासा कह, शब्द अनाहद कोई लहे।।
सोहं ऊपर अलख मुकाम, संतो परस लाया विसराम ।।
सोहं चाल सुने सोई कहे, सोहं चाल कोई बिरला लहे।।
सोहं ऊपर आप विराजे, कोई बिरला जाय अधर में छाजे।।
पानप सतगुर सेती पाया, सुरत पकड़ के तहां समाया।।
कहै पानप नाम प्रचंड है, जो कोई धारै हृदय माहिं।
चार वर्ण और तीन लोक से, ऊँचे दै चढ़ाहिं।।
कहै पानप नाम प्रचंड है, धरा सबके सीस।
सुरत विचारे दसवें द्वारे, तब पावै जगदीस ।।
सतलोक सतगुरु से पावै, मनसा धर मन सेव लावै।।
मनसा फंदी बिना फंद जाय, अधर अलल में रही ठहराये।
अन्तर ताँती बाजन लागी सुनके धूनि ताके रंग पागी ।।
पानप कहै संत होय ऐसा, भव से पार मिटे यम त्रासा।।

सुर्ति योग

सकल पसारा सुरत का, सुर्त करे सोई होय।
सुरत लगे जो नाम से पानप, बिथा रहे नहीं कोय।।
सुरत करे सब काम, सुरत सू सब ही सुझे।
मन अपने की कला, सन्त कोई बिरला बुझे ।।
मन सूँ सुरत मिलाइये, चहूँ-दिस चाँदना होय।
कहै पानप सुनो भाई साधो, हरजन बूझे कोय।।
सुरत करे जो कारज होय, जिभ्या कहै काराज नहीं कोय।।
सुरत लगै जो मनकू धाय, दरसन पलक बिछड़ नहीं जाय।।
जो जन अपना मन पहिचानै, हरि की भक्ति सोईजन जानै।।
बिन मन खोजे भक्ति न होई, मन बिन यतन भक्ति योहि खोई।।
मन के मरहम भरथरी योगी, राज त्याग के भए वियोगी ।।
अपने मन में सुरत समोई, अन्तर गत की दूबधा खोई।।
योग युक्ति कर मुक्ति पहिचानी, भक्ति मुक्ति पाई निरवाणि ।।
मनसूँ मिलकर गोरख खेला, परम पुरूष सूँ पाया मेला।।
सिध भए सब सृष्टि चिताई, उन या मन की गति मति पाई।।
मन मिल खेले गोपी चन्दा, परचा पाया भए अनन्दा।।
दास कबीर यो मन जाना, सतगुरु मिल के मन पहचाना।।
आँठों पहर रहै लौलीना, हरि सुमरन से मन थिर कीना ।।
जन पानप विनती करें निज दासन के दास।
मन पहचान सुरत जब लागी, तब वाणी भई प्रकास ।।
कहन सुनन की गम नहीं, जो प्रभु करे सोई होय।
करण हार और नहीं दूजा, घट में सूझा सोय ।।
साँच बिना सुख नाहीं भाई साधो साँच बिना सुख नाहीं ।।
साची कहूँ न मानै कोई, मिथ्या सूं सिर मारै।
भव जल माहिं जिहाज नाम बिन कहो कौन पार उतारै ।।
साँची संत विचार कहत है बिरला चित बसावै।
चन्दा सूर इक कर राखे तो अलख पुरूष दरसावै।
साँची मूरत लाय मन राखे, पल थिर ठहराई।
सहजै प्रगटै उजियारी, तिमर सब नस जाई।।
एक भवन जाके दस दरवाजे नौंवे खुले सोई छारा।
नौ खंड खोज दसों दिस खेले, सोई गुरु हमारा।।
सुन्न सरोवर निर्मल तीरथ, नहाय सो उज्जवल होई।
सेवा पूजा सनमुख आत्म, और न दूजा कोई।।
शब्द हमारा ना पहचाने, भ्रम में जन्म गवाँवै।
कहै पानप बिन शब्द गुरु के, जन्म-जन्म दुख पावै।।
आठों पहर युक्त सो योगी, गगन गुफा में रहना।
पानप कहें यो साँची, भ्रम साथ नहीं बहना।।
करना हो सो सब कर लीजो, अकरन भरी बात।
कहै पानप अकरन यो ही, मन में सुरति समात ।।
करनी करे सो करम है, यम सूँ जीव न छूटे।
अकरन करे कहैं जन पानप, तब यम का जाला टूटे।।
मन भटके सुरत भटके, मुर्ख न काया त्रासी ।
कहै पानप यों भरम भुलाना, गल पड़ी यम की फाँसी।।
जिस साधा सुरत मन, तुरन्त तमासा देखा।
कहै पानप निर्मल ज्योति प्रकाशी, मिट गये सभी परेखा।।
जो कुछ कीजे सुरत सूँ, सो करनी प्रमाण।
कहैं पानप किये देह के रीझे ना भगवान।।

तीर्थ

हरि नाम बिसारा हृदय, सो नर कहीं का न हुआ।
तीर्थ व्रत. जप तप करके कहै पानप वह मुआ।।१।।
हरि का सुमरन ना करे, तीर्थ दौड़ा जाय।
बिन प्रतीति भटकता डोले, यम के हाथ बिकाय।।२।।
हरि का नाम धरा जिन हृदय,सो काहे को तीर्थ जाय।
घर में आत्म चीन्हा पानप, अष्टयाम तहाँ नहाय ।।३।।
भवजल में तीर्थ घने, मैं किस किस तीर्थ जाऊँ।
मन विकार तजता नहीं, कहै पानप कहाँ कहाँ नहाऊ ।।४।।
अष्ट-कंवल-दल अंतर भीतर, तीरथ एक अनूप।
सुरत धोय मन निर्मल होई, परसूँ देव अरूप।।५।।
पार-ब्रह्म घट में ही छोड़ा, तीरथ बह-बह मुआ।
अन्तर खोज सुरतसूँ पानप, ताको दर्शन हुआ ।।६।।
जीव हद का हरि कैसे पावै, राम हदसूँ आगे।
कहै पानप हरजन सोई, पहले हद को त्यागे ।।७।।
हद तजी बेहद में खेला, अलख पुरूष दरसाया।
कहै पानप नैन नासिका अग्रह, राम रहै नित छाया ।।८।।
तीर्थ की आसा नहीं, व्रत गया सब भूल।
कहै पानप नैन नासिका अग्रह, रहै पहुप से फूल ।।९।।
राम नाम के आसरे, मनसूँ सुरत मिलाई।
कहै पानप हरि दर्शन हुआ, यो सतगुरु जुगत बताई ।।१०।।
नहीं भरोसा सत का, जग मिथ्यासू लाग मरा।
कहै पानप तीर्थ व्रत कर, कहो कौन-कौन तिरा ।।११॥
काम न छूटा क्रोध न छूटा, छूटा लोभ न मोह।
कहै पानप तीर्थ भरमाया भोंदू, क्या फल लागा तोहि।॥१२॥
काम-क्रोध-लोभ-मोह की, बाँध लई है पोट।
इनका भय मानू नहीं पानप, पकड़ी हरि की ओट ।।१३।।
हम तो बुड़े अथाह में, जहाँ बिन पानी दरियाव।
जहाँ के बुड़े पानपा, हरि दर्शन सहज सुभाव।।१४।।
हिन्दू करे व्रत और तीरथ और करे सेवा पूजा।
कहै पानप अंतरयामी अंतरमाहि सो सपने ना सूझा ।।१५।।
कोटिक जप-तप तीर्थ कर, साहब दुष्टि न आवै।
पानपदास तुरंत होय दरसन, जो ब्रह्म-अग्नि में तपावै ।।१६।॥
ब्रह्म-अग्नि में मन तपे त्रिवेनी नित नहाय।
कहै पानप वा संत को, जुरा मरन मिट जाय।।१७।।
बैरन आगे गंग है, तहाँ न कोई नहाय।
कहै पानप अलपा नदी, सब जग दौड़ा जाय।।१८।।
कर्मों छाई आत्मा, मल लिपटानी सोय।
कहै पानप अलपा के नहाए निर्मल केह विध होय।।१९।।
मोहि भरोसा नाम का, काया कासी खोजी।
कहै पानप उस अगम महल में, ज्योति निर्मल सूझी।।२०।।
यह तो कासी कहन की, साची कांसी काया।
कहै पानप निर्मल भया, जो तिरबेनी चढ़ नहाया।।२१।।
तिरबेनी चढ़े सुरत मन, परबी अष्टोयाम।
लौ लागी छूटे नहीं, कहै पानप दरसन राम।।२२।।
अकल कला अराध के, कर परमातमसू मेला।
कहै पानप अलख पुरूष को, दरसै सतगुरु का चेला ।।२३।।
नाऊँ जगन्नाथ नहीं द्वारिका, ना बद्री-कैदार।
घट में आतम लखा पानप, तुरंत भया दीदार॥२४॥
दसवें द्वारे जहाँ हरिद्वारा, तहाँ कोई न जाय।
कहै पानप हरिद्वार भ्रम को, दौड़ दौड़ जग नहाय।।२५।।
हमरे घर में हरि को द्वारा, बारामासी मेला।
बाहर कहाँ हरिद्वार है पानप, जगत फिरे है भूला ।।२६।॥
हमरो नहान सुन्न के सरोवर, जहाँ आठ पहर को नहाना।
कहै पानप आतम का दर्शन कहीं एक पल नहीं जाना ।।२७॥
हरि दर्शन को कोई न चाहै, कर रह्यो मते घनेरे।
सुन्न सरोवर अन्तर पानप, कोई बिरला संत बसेरे ।। २८॥
सुन्न तलासी सुरत के सतगुरु गम मन पाया।
बाँध सूरत के तारखूँ पानप, सुन्न में जाय बसाया।। २९।।
सुन्न कहा मस्तकरूँ नीचे, नैन नाससूँ ऊँचे।
कहै पानप वहाँ हरिजन नहाय, पलपल नहाय सूँचे ।। ३०॥
दो नेत्र बिच नासिका, जहाँ सरोवर मान।
कहै पानप सतगुरु मिले, सुरतसूँ लेत पहिचान।।३१।।
सुन्न देस में राखे बंद्य, निसदिन ताके सत् की संघ।
सत् की संघ तके सुख होय, अलख दरस बिछड़े नहीं कोय।। ३२॥
मन थके मनसा थके, सहज स्वाँस थक जाय।
चाल पलटे पानपा, यम न सतावे ताय।। ३३।।
घट-घट अमृत सर भरे, पीवे कोई नाहि।
कहै पानप अमृत तजो, जगत प्यासा जाहि ।।३४।।
निकट नीर प्यासा मरे, यही अचंभा मोहि।
भर-भर दृष्टि सुरत पीवे पानप, बहुरि प्यास नहीं होहि ।। ३५॥
मन धोय तन निर्मला, तन धोय मन मैला।
कहै पानप तन कहाँ लग धोऊँ, विषम मैल तन फैला।। ३६।।
मन मैला तो सब तन मैला, तन धोवे सब कोय।
तन धोय मन उज्जवल नहीं, पानप मन धोवे न कोय ।। ३७।।
जब लग भटके सुरत मन तब लग गंदम-गंदा।
कहै पानप निर्मल तब ही जानो, थिर होय सूरज चन्दा।।३८॥
कर स्नान सुरत के जलसूँ, मन सागर में नहावै।
पानप कहँ जुगत कर ऐसी, आवागमन नसावै ॥ ३९॥
निर्मल नाका नाम का, सत्गुरु दिया बताय।
चितवन के तो निकट ही, पानप जिनकी सूरत समाय।।४०।।

राग देव गंधार

मन तोही अन्त नहीं तर जाना।
मन को खोज ले मनसासू, मनमाहिं ठिकाना ।।
टेक मन ही में गंगा मन ही में यमुना, मन ही में सात समंदा।
मन ही धरनी आकास, मन ही में सूर्य चन्दा।।१।।
अहसठ तीर्थ या मन माँहि तामें संत करे स्नाना।
सुरत नहाय निर्मल होय, अचरज देख बखाना।।२।।
कस्तूरी जैसे नाभि मृग के, बन बन ढूँड़त डोले।
जग बौरा प्रभु अन्तरयामी, मनसा अन्त न खोले।।३।।
निर्मल धाम प्रगट देखन में, जिन परसा तिन जाना।
कहै पानप सुनो भाई साधो, छूट गया भरमाना।।४।।

राग भैरव

हाय क्यों न बौरा मन नहाय क्यों न बौरा।
नैनन आगे गंग है, नहाय क्यों न बौरा।। टेक

संग अमृत-रस तज मन भौंदू, अलपा नदी को जात है तू दौरा ।।१।।
गंगा यमना और सरस्वती, बही जात हैं संग तेरे धोरा ॥२॥
जहाँ नहाय तन निर्मल होई, यह मनवा मैल त्यागेगो तोरा ।। ३॥
अजहुँ समझ मेरे मन भोंदू, जन पानप तेरा करत निहोरा ।।४।।

'योग'

काया सोध

गंगा जमुना और सरस्वती, बरसे झिलमिल धारा।
बिना नयन कोई कोई परखे, रूप अरूप अपाारा।।१।।
निकट नाक सुध सुधी लाई, सुरत भई पटरानी।
सज्जा मिली बहुत सुख देखे, तब बहती थीर ठहरानी ॥२॥
साधो सब सुरत के खेल, सुरत बिना नहीं पावे ।
दीपक बले तेल बिन बाती, जब मन में मुरत समावे।।३।।
धुन उपजी मन से मन खोजा, धुन में रहा समाई।
वह धुन लागी बहुत प्यारी, पलक न बिसरी जाई।।४।।
पाँच पचीस सुन्न में सिमटी, लगी ब्रह्म की पूजा।
काया सोध यो तत्व पाया, सब घट एक ही सूझा।।५।।
भँवर गुफा में आसन माँडा, मनसा मंडप ताना।
धुनी ध्यान तपे मन तामें, तब सीतल भये प्राणा।।६।।
सीतल भया मिटी जब तपना, मूल मन्त्र आराधूं।
सुमरन करूँ बिना ही रसना, सुखमन पिंगल साधू ।।७।।
हर-हर रटन रैन दिन लागी, बिसरे ते मर जाऊँ।
काया सोधत आत्म सूझा, घट में दरसन पाऊँ ।।८।।
योग युक्ति का अधर सिंहासन, अलख पुरूष की पूजा।
भ्रम बिलाया घट में पाया एक, और नहीं दूजा ।।९।।
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