संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

गुरु-भक्ति (सेवा)

गुरु भक्ति के बिना होवे न आत्मज्ञान, गुरु कृपा के बिना लगे न आत्म बोधी ध्यान । जप-तप-पूजा-पाठ करते करोड़ों नर-नारी, मोक्ष किसी को मिली नहीं, ना जब तक गुरु कृपा-दृष्टि डारी ॥ 

उपरोक्त संत कथन से यह ज्ञात होता है कि गुरु की दया के बिना सही ध्यान तथा आत्म ज्ञान नहीं हो सकता और गुरु-कृपा उसी पर होती है जो अपने सुख की कामना त्याग कर गुरु की तन-मन-धन से सेवा करता है, जो गुरु की आज्ञा में अपनी रहत बनाता है। गुरु ग्रन्थ साहब में लिखा है-

बीस बिसवे गुरु को माने, सो सेवक परमेश्वर की गत जाने । रहत प्यारी मुझको सिख प्यारा नाहीं । रहणी रहै सोहि सिख मेरा, वो हमरा साहेब मैं उसका चेरा ॥ 

इन गुरु वाक्यों से सिद्ध होता है कि जो गुरु को खुश कर लेता है वही परमात्मा को प्राप्त करता है। दूसरे सबद का अर्थ है कि जो गुरु की आज्ञानुसार चलता है, गुरु उसको ब्रह्म रूप बना देता है और उसके साथ अपने मालिक जैसा बर्ताव करता है। ये सब गुरु भक्ति का फल है। गुरु को खुश करने के लिए जो भक्ति या गुरु सेवा की जाती है उसका संकेत नीचे दिया गया है। 

गुरु सेवा तीन प्रकार की होती है-तन की सेवा, धन की सेवा और मन की सेवा। 

1. तन की सेवा 

अपने शरीर से गुरु के शरीर की सेवा करना जैसे चरण दबाना, आसन बिस्तर सँवारना, वस्त्र धोना, गुरु को स्नान तथा भोजन कराना आदि। कभी गुरु के संग चलना पड़े तो एक कदम पीछे रहें, यदि कुछ बात गुरु से करनी हो तो गुरु के बाँये होकर करें, कभी गुरु के दाहिने तरफ न जायें। गुरु से उच्च आसन पर न बैठें। गुरु जब भोजन करें तो उनके एकान्त को भंग न करें। जब गुरु आराम कर रहे हों तो किसी प्रकार की बाधा न डालें। इसके अलावा जब गुरु कोई भी काम करने का आदेश देवें तो उसे फौरन मानें। ये तन की सेवा तभी सार्थक होती है जब निष्काम भाव से अपने शरीर के सुख-दुख की परवाह न करते हुए केवल गुरु के सुख तथा खुशी का मन में ध्यान धर के सेवा करें। जो कोई शिष्य तन से गुरु की सेवा करता है उसके तन के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। तन की सेवा सब से नीकी होती है और नीकी में ही भगवत कृपा होती है जिससे सुख-सम्पत्ति तथा आनन्द रूपी फल मिलता है। 

2. धन की सेवा 

जब गुरु-दर्शन को जावें तो श्रद्धा अनुसार गुरु को भेंट चढ़ावें। जो भी भेंट चढ़ावें, उसका दिल में न तो अभिमान करें न ही इधर-उधर बखानते फिरें। गुरु अपनी मौज से उस धन का चाहे जो कुछ करें, चाहे मन्दिर बनायें, चाहे किसी को दान दे देवें, उसको देखकर दिल में दुःख-सुख न लावें । गुरु आज्ञा को हितकर समझें। जो अपना सब कुछ गुरु को अर्पण कर देता है, उसका कल्याण हो जाता है। 

3. मन की सेवा 

गुरु को शरीर रूप न समझ शक्ति रूप ब्रह्म ही देखें। सब जगत की आशा त्याग कर गुरु हृदय में बसावें। जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति से व्यवहार करती है, गुरु को वैसी ही सेवा से रिझावें। इसी को सगुण उपासना कहते हैं। इससे ध्यान परिपक्व होता है तथा शब्द का साक्षात्‌कार होता है, मन के सब विषय छूट जाते हैं तथा निज रूप का दर्शन हो जाता है। 

गुरु भक्ति निष्कपट भाव से करनी चाहिये। कपटपूर्ण सेवा का फल अन्ततः दुःखदायी होता है। जैसे परशुराम केवल ब्राह्माणों को ही धनुर्विद्या सिखाते थे। कर्ण ने कपटपूर्वक ब्राह्मण बन परशुराम से धनुर्विद्या सीखी।

एक दिन जब परशुराम अपना सिर कर्ण की जंघा पर रखकर सोये पड़े थे. एक जंगली कीड़े ने कर्ण की टांग पर काट लिया जिससे कर्ण की टांग में भयंकर पीड़ा हो रही थी और बहुत खून बह रहा था, लेकिन कर्ण ने यह सोचकर कि गुरु के विश्राम में विघ्न न पड़े, न तो अपनी टांग ही हिलाई और न ही कोई आवाज़ की और न ही उस कीड़े को हटाने का प्रयत्न किया। जब परशुराम की आँख खुली तो वे कर्ण की गुरु भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए मगर उन्हें शक हुआ कि यह कर्ण ब्राह्मण नहीं क्षत्रिय है। पूछताछ करने पर कर्ण ने अपना सच्चा वर्ण-क्षत्रिय बता दिया। उस पर परशुराम ने कहा जो विद्या कपट से सीखी जाती है वह समय आने पर भूल जाती है यानि धोखा देती है और ऐसा ही कर्ण के साथ हुआ। 

कई लोग गुरु सेवा को गुरु का स्वार्थ समझते हैं तथा अपना कल्याण केवल भजन द्वारा ही समझते हैं। उनका ख्याल होता है कि भजन सेवा से ऊँचा है। सच्चाई यह है कि सेवा और भजन साधना रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं जिस पर सुर्ति सवार होकर निज धाम पहुँचती है। बिना सेवा के भजन में अहंकार आ जाता है जो पतन का कारण बनता है। भजन करने वाले ज्ञानी लोग प्रायः इसकी लपेट में आ जाते है और सेवा के साथ भजन करने वाले अहंकार अग्नि से बच जाते हैं। रामायण में एक प्रसंग है जिसमें लक्ष्मण जी शूर्पणखा से कहते हैं –

सेवक सुख चह, मान भिखारी, व्यसनी धन सुभ गति व्यभिचारी । लोभि यश चह चार गुमानि, 

नभ दुहि दूध चहत ए प्राणी ॥ 

अर्थात् सेवक होकर सुख चाहे, भिखारी मान चाहे, व्यसनी-जुआरी, शराबी धन चाहे, लोभी यश चाहे, अभिमानी चारों पदार्थों की इच्छा करे तो ऐसा मानो कि यह आकाश से दूध दुहना है जो कि असम्भव है। तात्पर्य स्पष्ट है कि सेवक को अपने सुख की इच्छा त्याग कर सेवा करने से ही सुख मिलता है। 

गुरु अमरदास की गुरु सेवा एक ज्वलन्त उदाहरण है। पहले वे लंगर की सेवा करते थे फिर गुरु अंगद देव नें उन्हें शरीर की सेवा बख्शी। गुरु अमर देव आधी रात उठकर तीन कोस से व्यास नदी से पानी लाकर प्रातः गुरु को स्नान कराते थे । जाते समय वे उलटे पाँव जाते थे ताकि गुरु की तरफ पीठ न होवे । एक दिन जब वे पानी ला रहे थे, अंधेरी रात तथा वृद्ध अवस्था होने के कारण जुलाहे की खड्डी में गिर गये। आवाज सुनकर जुलाहे की पत्नी ने कहा-देखो वह अमरू निथाँवा गिरा होगा। जिसका कोई घर-घाट नहीं। रोटी के लिए गुरु- घर में पानी ढोता रहता है और गुरु अंगद देव भी बड़े निर्दयी हैं जो इस बिचारे पर दया नहीं करते। यह सुन अमर देव बोले-‘पगली मेरे गुरु को निर्दयी न कहो, वह तो दया के भंडार हैं।’ इतना कहते ही जुलाहे की पत्नी पागल हो गई। जुलाहे ने गुरु अंगद देव को जाकर सारी बात बताई । गुरु अंगद देव दौड़ पड़े और अमर देव को उठाकर गले से लगा लिया और गद्गद् होकर वरदान देने लगे कि “यह निथाँवा नहीं है, यह तो निथाँवों की थाँ, न ओटियों की ओट, न पत्तयों की पत्त, न गत्तयों की गत्त, निरआश्रयों का आसरा तथा निर्लज्जों की लाज है। आज से यह गुरु-पद प्राप्त कर गुरु अमरदेव हो गये।” 

सेवा ने ही सब कुछ बख्श दिया। महावीर (हनुमान जी) सेवकों में शिरोमणि माने जाते हैं। उनका कहना है कि भजन वहाँ नहीं पहुँचा सकता जहाँ सेवा पहुँचा देती है। सेवक को चाहिये कि गुरु वाक्य को ही मूल मन्त्र समझे । गुरु-मन्त्र लेकर गुरु-वाक्य से बाहर रहने से मन्त्र फलदायी नहीं होता । मंत्र का सिमरन करते रहना लेकिन गुरु-वाक्य को तुच्छ समझ कर आज्ञा का पालन न करना, ऐसा सिमरन भजन नर्क में पटक देता है। आत्मज्ञान का मूल गुरु कृपा में है। जिस समय गुरु कृपालु होकर मेहर की नजर करते हैं तो सभी पाप जल जाते है, संकल्प-विकल्प खत्म हो जाते हैं और आत्म रुप निर्विकल्प समाधि का आनन्द आता है।

Call Us Now
WhatsApp