संत अमर सिंह जी का जन्म 15 नवंबर 1935 को दिल्ली के एक छोटे से गांव बुधपुर में हुआ था, जो दिल्ली से 22 किलोमीटर कर्णाल की दिशा में जी.टी. रोड पर स्थित है। उनके पिता का नाम श्री ब्रिजलाल भारद्वाज और माता का नाम श्रीमती रामकली था। उनके दादा, श्री मंडुराम जी, अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध और सम्मानित व्यक्ति थे। गांव में बहुत समय पहले एक सिद्ध बाबा तपस्या किया करते थे, जो बुद्धेबाबा के नाम से प्रसिद्ध थे। उनके सम्मान में आज भी हर साल भादो माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मेला लगता है, जो आस-स के इलाकों में बहुत प्रसिद्ध है।
संत अमर सिंह जी की जनकल्याण सेवा के कारण बुधपुर गांव का नाम न केवल भारत के हर कोने में बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध हो गया है। जैसे इंग्लैंड, कनाडा, अमेरिका, नॉर्वे, स्विट्ज़रलैंड, नैरोबी (केन्या), नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रूस, दुबई आदि देशों में भी। इन सभी स्थानों से लोग यहां आ चुके हैं, जिससे यह गांव विश्व भर में जाना गया है।
आपको बचपन से ही भगवान भक्ति की लगन थी, लेकिन किसी प्रकार की विधि, विदांत, या पूजा- र्चना का ज्ञान न होने के कारण आपने अपनी मनमानी तरीके से भगवान शिव का ध्यान और पूजा की। कुछ समय बाद, एक संत तुलसीदास जी, जो शिव भक्त थे, से आपकी मुलाकात हुई। उन्होंने आपको शिव भक्ति की विधि सिखाई, और आप उसी के अनुसार शिव भक्ति करने लगे। शिव भक्ति में लगे रहने के कारण आपका व्यवहार और काम करने का तरीका सामान्य लोगों से भिन्न हो गया। इस कारण से कुछ लोग आपको पागल और कुछ लोग भोला कहकर मजाक उड़ाते थे।
एक बार भक्त संतलाल और प्यारेलाल, जो आपके परिचित थे, ने कहा कि एक बहुत बड़े संत आए हैं। आप उन संत श्री श्रद्धाराम जी के साथ थे, जो अलौकिक तेज और चमक से प्रकाशित हो रहे थे। उनके व्यक्तित्व में दिव्यता झलक रही थी।जब आपने उनका दर्शन किया, तो आप उनकी ओर खिंचते चले गए और फुट-फुट कर रोने लगे। आपने अपने आप को उनके चरणों में समर्पित कर दिया।
हालांकि आपकी शादी पहले हो चुकी थी, फिर भी आपने घर- र छोड़कर, श्रद्धाराम जी के कहने पर, उनके साथ उनके स्थान, ओम दरबार, नंदाचौर, जिला होशियारपुर, पंजाब की ओर चले गए और वहां पांच साल तक रहे। इस दौरान आपके परिवार वालों को आपकी कोई खबर नहीं थी, क्योंकि आप सब कुछ त्याग कर सन्यास का जीवन जीना चाहते थे। लेकिन सर्वज्ञ और अंतर्यामी श्री श्रद्धाराम जी कहते थे कि आपको गृहस्थ जीवन का अनुभव करना ही पड़ेगा और जब तक आप यह आदेश नहीं मानेंगे, तब तक हम आपको दीक्षा (नामदान) नहीं देंगे।
अंततः, ढाई साल की कठिनाई और संघर्ष के बाद, आपने संत श्रद्धाराम जी की आज्ञा मानते हुए, चेत्र मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी विकर्मी सम्वत 2011 (सन् 1954) को ब्रह्मस्वरूप श्री श्रद्धाराम जी ने आप पर अनंत कृपा करते हुए आपको दीक्षा दी और आत्मबोध साधना की विधि तथा रहस्य बताया। गृहस्थ जीवन का रहस्य बताते हुए कहा कि इस तरह गृहस्थ जीवन निर्वाह करना सन्यास के बराबर ही है। दीक्षा और उपदेश के बाद, उन्होंने अपनी पगड़ी आपके सिर पर रख दी और कहा कि सन् 1993 में आप मेरे जैसे हो जाएंगे। इसके बाद, आपको तुरंत घर जाने का आदेश दिया। घर जाकर, गुरु की आज्ञा अनुसार, आपने गृहस्थ जीवन जीना शुरू किया। आपकी पत्नी इंद्रावती जी, जो बहुत सरल स्वभाव और भक्तिभाव वाली महिला हैं, आपकी साधना में कभी बाधक नहीं बनी, बल्कि सहयोग ही करती रही।