दिल्ली से 22 किलोमीटर करनाल की तरफ जी.टी. रोड पर स्थित एक छोटा-सा गाँव ‘बूढ़पुर’ वह पवित्र भूमि है जिसे संतभूमि कहा जाना चाहिए। इस गाँव का नाम ‘बूढ़े बाबा’ नाम से प्रसिद्ध एक सिद्ध बाबा के नाम पर रखा गया है, जिनके नाम पर इस गाँव में आज भी हर साल भादो माह की शुक्ल पक्ष द्वितीया को मेला लगता है। इसी गाँव में 15 नवम्बर 1935 को संत अमर सिंह जी महाराज का जन्म हुआ था और उन्हीं के परिवार में 10 जनवरी 1960 को संत सत्यपाल जी महाराज का जन्म हुआ। पिता आत्मज्ञानी संत, महान कर्मयोगी; नियम, संयम, तपस्या और अनुशासन जिनके आदर्श रहे। माता श्रीमती इन्द्रावती धार्मिक, सत्यनिष्ठ और सरल स्वभाव वाली महिला है ऐसे माता-पिता से प्राप्त संस्कारों से आप में अध्यात्मिकता की लगन होना स्वाभाविक ही था। बचपन से ही संतों के चरित्र, जीवनी और सत्संगों में आपकी रुचि रही। आपको कबीर जी, गुरुनानक जी, रविदास जी. गरीबदास जी आदि संतों की किताबें पढ़ने और परमात्मा का साक्षात्कार कैसे किया, यह जानने की लालसा रहती थी।
संत सत्यपाल जी अपना अधिक से अधिक समय संत श्रद्धाराम आत्म-बोध आश्रम में पिता संत अमर सिंह जी महाराज के सान्निध्य में व्यतीत करते थे और आश्रम की गतिविधियों में सहयोग करते थे। आपको महाराज जी के प्रवचन और आत्मबोध संबंधी चर्चा अत्यंत प्रभावित करती थी। 17 जनवरी 1983 को आपने दरबार बापू ज्वाला सिंह जी महाराज सहारनपुर में गद्दीनशीन पू. महंत बापू दया किशन जी महाराज से ‘नाम-दान दीक्षा’ प्राप्त की आप समय-समय पर अपने गुरु स्थान, सहारनपुर जाते रहते थे और वहाँ महाराज जी तथा दरबार की सेवा किया करते थे। आप महाराज जी से हमेशा आत्मज्ञान एवं परमात्म प्राप्ति की ही बातें किया करते थे। महाराज दया किशन जी आपकी आध्यात्मिकता व परमात्म प्राप्ति की लगन देखकर बहुत प्रसन्न होते थे। वे आपको प्रेमपूर्वक ‘पंडित जी’ के नाम से भी पुकारा करते थे।
आपकी आत्म-साक्षात्कार की लगन दिन-प्रतिदिन बढ़ती गयी, जिसे देखकर बापू अमर सिंह जी महाराज ने कई बार आपको ‘शक्तिपात’ द्वारा अनेक अलौकिक अनुभव और अकल्पनीय अनुभूतियाँ करवायीं। आप उन भावावेशों में छिपी हुई एक महान महिमा की अनुभूति करते थे। उस समय आपके अंतःकरण की भावना न जाने कितने ही अलौकिक दशाओं की प्राप्ति करती और आप. काफी समय तक उन्मनी अवस्था में स्थिर रहते। आपको महाराज जी आत्म-बोध साधना की विधि और रहस्यों से अवगत कराते थे और आप उनके निर्देशानुसार साधना व सुमिरन करते रहते थे। अंततः एक समय ऐसा आया जब आपकी साधना, लगन, श्रद्धा और निष्ठा को देखकर महाराज जी ने आपको अपना ही स्वरूप बना दिया। आपकी पत्नी श्रीमती कृष्णा जी अत्यंत सरल स्वभाव व भक्तिभाव वाली स्त्री हैं। वे आपकी साधना में कभी भी बाधक नहीं बनीं।
बापू अमर सिंह जी महाराज जब कुछ अस्वस्थ रहने लगे तब उन्होंने भविष्य में मन्दिर व आश्रम की व्यवस्था के सुचारू रूप में निर्वाहन के लिए बापू जी की सत् प्रेरणा व श्री ओम् दरबार नंदाचौर की सहमति से श्री सत्यपाल जी को आश्रम का ‘मुख्य सेवादार’ नियुक्त करते हुए ‘सेवा की पगड़ी’ प्रदान करने का निर्णय लिया। संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम के 18वें वार्षिक सत्संग यज्ञ के दिन, दिनांक 28 मार्च 2010 को बापू अमर सिंह जी महाराज ने अपने गुरु स्थान श्री ओम् दरबार नंदाचौर में गद्दीनशीन श्री हर भगवान जी महाराज के शुभकर-कमलों व आशीर्वाद के साथ पूरे विधि-विधान से अपनी शक्ति-संचार प्रतीक स्वरूप पगड़ी आपको पहनवायी। साथ ही आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा, “बापू जी से प्रार्थना करता हूँ कि वे सत्यपाल जी पर मेहर भरा हाथ रखें और उनको सौंपी गयी आश्रम की महान सेवा को निष्ठापूर्वक निभाने की शक्ति प्रदान करें।” उस समय से श्री सत्यपाल जी महाराज पूरी निष्ठा, लगन तथा गुरु समर्पण की भावना से आश्रम तथा आश्रम में आने वाले श्रद्धालुओं की सेवा कर रहे हैं।
बापू अमर सिंह जी महाराज के (2 दिसम्बर 2011 को) ब्रह्मलीन हो जाने के पश्चात से बापू जी की कृपा व आशीर्वाद से श्री सत्यपाल जी महाराज प्रवचन और नाम-दान दीक्षा द्वारा लोक कल्याणार्थ कार्य कर रहे हैं। आपका उद्देश्य भी आत्म बोध की शिक्षा-दीक्षा देना ही है। अपने प्रवचनों में आप संगत को यही समझाते रहते हैं कि ‘सत्यता को प्राप्त हो जाओ। अपनी आत्मा को जानो; क्योंकि आत्मा ही परमात्मा है। हमें मनुष्य जन्म परमात्मा को पाने के लिए ही प्राप्त हुआ है।’
“तू आप अपनी याद कर, फिर आत्म को तू प्राप्त हो। ना जन्म ले मर भी नहीं, मत ताप से संतप्त हो।। जो आत्मा से परमात्म है, तू आत्म में संतृप्त हो। यह मुख्य तेरा काम है, मत देह में आसक्त हो।”