संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

मानवदेह

चेतन, माया और माया में चेतन का प्रतिबिम्ब-इन तीनों की त्रिपुटि को जीव कहते हैं। जीव के रहने के स्थान को देह कहते हैं। मानव देह को सचखण्ड, ब्रह्माण्ड, अण्ड तथा पिण्ड भागों में बाँटा गया है। अधिकतर सन्त, महात्मा तथा साधुओं ने अण्डदेश (सहस्र दल कमल) का अलग से वर्णन न करके उसे भी ब्रह्माण्ड में माना है। इन सबका बयान (वर्णन) ब्रह्मपथ यात्रा में सविस्तार किया है। देह चार होते हैं :-

1. स्थूल शरीर – जो शरीर हमें भासमान हो रहा है। यह पाँच तत्व और पच्चीस प्रकृतियों का बना है। 

2. सूक्ष्म शरीर – पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन तथा बुद्धि इन सत्रह तत्वों से निर्मित है। 

3. कारण शरीर – यह मन बुद्धि, अहंकार तीन तत्वों का बना है। 

इसमें सत, रज, तम तीनों गुण व्याप्त हैं। महापुरूषों ने इसे अक्षर पुरुष नाम से भी पुकारा है। 

4. महाकारण शरीर – यह परम चेतना या तुरिया अवस्था है। 

देह के पाँच तत्व 

1. आकाश – इसकी तन्मात्रा शब्द, ज्ञानेन्द्री कान, देवता सभी दसों 

दिशायें, कर्मेन्द्री मुख है। यह श्याम वर्ण का कड़वे स्वाद वाला है। इसका निवास शीश, आकार शून्य तथा आहार शब्द है। इसकी प्रकृति आकाश से शोक, वायु से काम, अग्नि से क्रोध, जल से मोह, पृथ्वी से भय, पाँच है। जब योगी इस तत्व को जीत लेता है तो अपने आप में मस्त हो जाता है। 

2. वायु – वायु तत्व की तन्मात्रा स्पर्श, ज्ञानेन्द्री त्वचा, कर्मेन्द्री हाथ है। इस तत्व का देवता पवन, रंग हरा तथा स्वाद खट्टा है। इसकी प्रकतियाँ वायु से धावन, आकाश से प्रसरण, अग्नि से वलन, जल से चलन और पृथ्वी से आकुंचन है। इसका आहार सुगन्ध तथा स्थान नाभि है। वायु तत्व जीतने से आकाश में उड़ने की सामर्थ्य आ जाती है। 

3. अग्नि इसकी तन्मात्रा रूप, ज्ञानेन्द्री नेत्र, कर्मेन्द्री पैर, देवता सूर्य, रंग लाल, स्वाद चटपटा है। इसकी प्रकतियाँ आकाश से निद्रा, वायु से तृषा, अग्नि से क्षुधा, जल से कान्ति, पृथ्वी से आलस्य है। इसका आहार लोभ, मोह तथा निवास स्थान पित्त है। इस तत्व को जीत लेने पर अग्नि में चलने की सामर्थ्य आ जाती है अर्थात् अग्नि जलाने में असमर्थ हो जाती है। 

4. जल – इसकी तन्मात्रा रस, ज्ञानेन्द्री जिह्वा, देवता वरूण, कर्मेन्द्री लिंग, रंग सफेद तथा स्वाद मीठा है। इसकी प्रकृतियाँ आकाश से लार, वायु से पसीना, अग्नि से मूत्र, जल से वीर्य, पृथ्वी से रक्त है। इसका आहार मैथुन, स्थान भाल है। जल तत्व को जीतने पर योगी जल पर आसन जमा सकता है। जल के ऊपर ऐसे ही चल सकता है जैसे पृथ्वी पर । 

5. पृथ्वी- इस तत्व की तन्मात्रा गंध, ज्ञानेन्द्री नाक, देवता अश्विनी कुमार, कर्मेन्द्री गुदा, रंग पीला और स्वाद मीठा है। इसकी प्रकृतियाँ आकाश से रोम, वायु से त्वचा, अग्नि से नाड़ी, जल से माँस, पृथ्वी से हाड़ है। इसका आहार खाना-पीना, निवास स्थान हृदय है। इस तत्व को जीत लेने पर योगी को गुप्त तथा प्रगट होने की सामर्थ्य आ जाती है। 

देह के प्राण 

इस देह में पाँच प्राण और पाँच उपप्राण ही प्रधान हैं जिनके बारे में नीचे लिखा गया है-

1. प्राण जो हम श्वास लेते और छोड़ते हैं उसको प्राण कहते हैं। इसका स्थान हृदय, रंग लाल तथा स्वभाव गरम है। इसकी चाल बाहर बारह उंगल तथा अन्दर सोलह उंगल है। 

2. अपान जो वायु विष्टा बाहर निकलती है उसे अपान कहते हैं। इसका स्थान गुदा, स्वभाव शीतल, देवता गणपति और चन्द्रमा हैं। यह बाहर से अन्दर को ठंडी होकर जाती है।

3. समान इसका स्थान नाभि में है और यह रस को पूरे शरीर में पहुँचाता है। 

4. उदान इसका कार्य ब्रह्म कुण्ड से रस प्राप्त करके समान वायु तक पहुँचाना है। इसका स्थान चोटी से गले तक है। 

5. व्यान – इसका कार्य रस को निर्मल करना तथा हरकत में डालना है। इसका स्थान पूरी देह है। 

6. कर्कल – ये भोजन को हजम करता है। इसका निवास स्थान पेट, देवता जठराग्नि तथा मन्दाग्नि है। 

7. कूरम – इसका काम आँख को खोलना बंद करना है। इसका स्थान आँख और देवता ज्योति है। 

8. नाग – इसका काम डकार लाना है। ये गले में रहता है, इसका देवता शेष नाग माना गया है। 

9. देवदत्त – ये छाती के नीचे रहता है। कामदेव इसका देवता है। स्तन में दूध पैदा करना तथा जम्हाई लाना इसका कार्य है। 

10. धनंजय – ये मृत्यु के बाद देह को फुलाती है तथा शरीर को कभी नहीं छोड़ती ।

पंचकोष 

मानव देह में पाँच कोष हैं, यानी जीवात्मा इन कोषों में ढका हुआ है। 

कोषों का वर्णन इस प्रकार है-

1. आनन्दमय कोष 

2. विज्ञानमय कोष 

3. मनोमय कोष 

4. प्राणमय कोष 

इन तीनों में सूक्ष्म देह रहता है 

5. अन्नमय कोष-इसमें स्थूल देह रहता है। 

ये सब स्थूल शरीर का वर्णन किया है। सूक्ष्म तथा कारण शरीर में, मन का खेल है जिसके बारे में मन शीर्षक से अलग वर्णन किया गया है।

उपरोक्त सभी रहस्य, पूर्ण गुरु की कृपा बिना नहीं मिलते। इसलिये साधक को चाहिये कि ऐसे गुरु की तलाश करें जो अनहद शब्द का मार्ग जानता हों तथा दृष्टि-साधना का भी ज्ञाता हो। तन-मन-धन से सद्‌गुरु की सेवा कर, उनकी कृपा प्राप्त कर, युक्ति सीखें तथा गुरु आज्ञानुसार कमाई करें। युक्ति के बारे में महापुरूषों ने ऐसा कहा है-

आँख कान मुँह ढाँप कर नाम निरंजन ले । अन्दर के पट तब खुलें, जब बाहर के पट दें। तीनों बन्द लगाय कर अनहद सुनो टंकोर। 

नानक सुन्न समाधि में नहीं साँझ नहीं भौर। 

पंडित नारायण दत्त ओमजी महाराज नंदाचौर वाले कहते हैं-

सहज साफ मधानि नाफ करो, दम कल्ब कलाम का नेता है। गुण ज्ञान का मखन निकल पड़े, ला जोर जिगर में जेता है। मटकी तन कर, सुरति से बन्द कर, जो सोये जुगत कर लेता है। मन मस्त दास होवे न क्यों कर, गुरु ज्वालासिंह तत्व बेता है ॥ 

भगवान श्री कृष्ण चन्द्र गीता के छठे अध्याय में कहते हैं, सुगम आसन पर बैठें, रीढ़ की हड्डी सीधी रखें, नजर को नाक की नोक पर रखकर फिर न हिलावें, श्वास के साथ-साथ प्रणव शब्द का जाप करें। 

अभ्यास में मन, शब्द, श्वास तथा दृष्टि आदि सबका महत्व है लेकिन सबसे अधिक महत्व दृष्टि का है। आत्मदर्शन (मोक्ष) की सर्वश्रेष्ठ युक्ति सहज समाधि है।

Call Us Now
WhatsApp