संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

जीवात्मा

आत्मा सर्वव्यापक, सर्वभूत प्राणियों की अन्तरात्मा, ज्योति स्वरूप, अजर, अमर, अक्षय, अविनाशी, आनन्दमयी तथा सदा मुक्त है। इसे जाने बिना मोक्ष पद में स्थिति नहीं होती। इस आत्म तत्व का सतगुरु के बिना ज्ञान नहीं होता। प्रू मध्य केंद्र स्थित यह ज्योति स्वरूप आत्मा उपरोक्त गुणवाला होते हुए भी माया के पर्दे में बन्दी प्रतीत होता है तथा जीवात्मा कहलाता है। जीवात्मा अंगुष्ठ मात्र परिमाप बाला तथा छः ज्योतिर्मयी मंडलों से युक्त रचना वाला है। हर एक ज्योति मंडल, एक में एक प्याज की तरह पर्त जैसे चढ़े हुए हैं। ये ज्योतिमंडल हैं:-

1. ब्रह्म मंडल – ज्योति पूर्ण हैं तथा आसमान की तरह सौन्दर्य पूर्ण है।

2. प्रकृति मंडल –  ब्रह्म मंडल के मूल (गर्भ) में परा प्रकृति के अंशों बाला पीले रंग का है जिसमें सत, रज, तम गुण व्याप्त है। यही जीवात्मा की लिंग देह है। इस मंडल में मन तथा इन्द्रियों की ज्योति भी है।

3. प्राणमंडल – प्रकृति मंडल के मूल में अतिसूक्ष्म प्राण मंडल है। यह
प्राण सब शक्तियों का स्रोत कहा जाता है क्योकि इसके बगैर समस्त संसार अचेतन हो जाता है। आत्मा के संयोग से ही प्राण को चेतना मिलती है। बुद्धि का स्थान प्रकृति और प्राण मंडलों के बीच में है।

4. अहंकार मंडल –  प्राण मंडल के अन्दर नीले हरे से रंग वाला अहंकार मंडल है। सत, रज, तम गुणों का जैसा प्रभाव होता है यह वैसी ही नई-नई ज्योति को प्रगट करता है।

5. चित्तमंडल – अहंकार मंडल के अन्दर ऐसे सफेद रंग का है जिसके
आर पार देखा जा सकता है। यह सभी संकल्पों के लिए सक्षम है। तीनों गुणों का इस पर अनेक प्रकार से प्रभाव पड़ता है तथा मन को जो भी ज्ञान होता है. उसकी छाप इस पर बन जाती है। इसे ही चित्रगुप्त की संज्ञा दी गई है।

6. आत्म मंडल – चित्तमंडल के अन्दर आत्मा का मंडल है। जब प्रकृति सारे मंडलों से युक्त होती है तो जीवात्मा बन जाती है। इस तरह से यह आत्मा जीव बन गई, देहरूपी आवरण चढ़ाकर द्वैत के चक्कर में फँस गई। यही आत्मा निरखा परखा है। आत्मा के जाने बिना बन्धन दूर नहीं होता और यह आत्मा इन मंडलों से विरक्त होने पर पारब्रह्म जानी गई। ब्रह्मज्ञानी संतों ने इसे ऐसा ही प्रवचन से कानों में सुनने से तथा बुद्धि से नहीं जानी जा सकती। जिसके चित के संस्कार मिट गये होते हैं यह उनके सामने सविज्ञान प्रगट हो जाती है। जिस ज्ञानी का अज्ञान नष्ट हो जाता है उसको यह आत्मा सहज ही सुलभ हो जाती है जिसे जानने के बाद और कुछ जानने को शेष नहीं रह जाता ।

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