संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

क्रम-चक्र विवेक

इस जगत में कर्म की प्रधानता है जहाँ बिना कर्म के कोई जीव नहीं है। परन्तु जो कर्म में अकर्म देखता है वह कर्त्ता नहीं बनता और जब कर्त्ता ही नहीं है तो भोक्ता भी नहीं है तथा कर्त्ता भोक्ता न होने से बन्धन से मुक्त है।
समस्त कर्म इन्द्रियों द्वारा प्रकट होते हैं। इन्द्रियाँ मन की आज्ञानुसार कर्म को उत्पन्न करती हैं। मन बुद्धि की सलाह के अनुसार इन्द्रियों को आज्ञा देता है। बुद्धि संस्कार कोष (चित्त) के अनुसार तीन गुणों का जैसा परिमाण होता है वैसी सलाह मन को देती है। इस प्रकार प्रकृक्ति-स्वभाव से ही कर्म प्रगट होते हैं। ज्ञानी कर्म-जाल में भी विरक्त होते हैं। गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसे समझ कर अडिग स्थिर रहते हैं। अज्ञानी, अहंकारी जो आसक्त हो कर कर्म करते हैं उनकी सुर्ति कर्म भोग चक्र में फंस जाती है तथा वे बहुत अधिक पीड़ा भोगते हैं। जीव प्रकृक्ति चक्र से बँधा है, इसलिए प्रकृति इससे जबरन कर्म करा लेती है तथा जीव कर्म न करना चाहे तो भी उसे करना ही पड़ता है। जीव के कार्य की गति उसके अपने स्वभाव, प्रकृति के मुताबिक होती है। स्वभाव प्रकृति का विरोध असम्भव सा लगता है, हाँ इसमें परिवर्तन बड़ी आसानी से किया जा सकता है।

इन्द्रियादि विकारों से सम्पन्न प्रकृति जीव को बन्धन में डालती है यही प्रकृति विकार रहित होने से मोक्ष प्रदान कराने वाली हो जाती है। जब तक शरीर है उस समय तक जीव को प्रकृति से बँधे रहकर कर्म करने ही पड़ेंगे क्योंकि इसके बिना जगत की व्यवस्था ही खत्म हो जायेगी। प्रकृति में रहकर जीव प्रकृति के गुणों को भोगता है और आसक्ति के कारण नाना प्रकार की अच्छी बुरी योनियों में जन्मता-मरता है परन्तु जो मनुष्य कर्म से विरक्त है उसके कर्म-अकर्म सब नष्ट हो जाते हैं। जब तक चित्त में संस्कार बाकी है मोक्ष नहीं मिल सकता है। ध्यान, योगाभ्यास से चित्त के संस्कार नष्ट हो जाते है तब सुर्ति गगन में निजधाम की ओर जाती है । संस्कार समूल खत्म होने पर कैवल्य पद प्राप्त होता है। ज्ञानी कर्म को कामना तथा संकल्प रहित निष्काम भाव से करता है इसीलिए कर्म बना से मुक्त है। अज्ञानी आसक्ति से कर्म करता है इसीलिए कर्म बन्धन में जन्मान्तर दुःख भोगता है। जो अज्ञानी धर्म के नाम पर अन्धविश्वास फंसता है. मनोरथ सिद्धि के लिए कुकर्म करता है वह नर्क गामी होता है तथा नीच योनि में जन्म लेकर दुःख भोगता है। इसीलिए मानव को चाहिये कि वह अपना सब कुछ परमात्मा को अर्पण कर देवे तथा सिद्धि असिद्धि समता का भाव रखे। जिस पद को ज्ञानी ज्ञान से प्राप्त करता है वहीं पर निष्काम कर्मों से भी प्राप्त हो जाता है। परमात्मा किसी के कर्म या कर्मफल निर्धारित नहीं करता। ये कर्म तो प्रकृति के संसर्ग में कामना से उदय होते हैं। जब तक जीव की कर्म में आसक्ति है तब तक करनी-भरणी जीव के साथ लगी रहती है। जीव जिस-जिस भावना को लेकर जीता है या देह त्यागता है उसकी छाप सूक्ष्म चित्त पर पड़ती है। इस छाप को ही संस्कार कहते हैं जिसके आधीन होकर भविष्य में या दूसरे जन्म में कर्म उदय होते हैं। शरीर में कुछ गुण स्थिर रूप से ही रहते हैं जिसके कारण मन तथा इन्द्रियाँ जल्दी प्रवृत्त हो जाते हैं। प्रकृति में रहकर जीव प्रकृति के गुणों को भोगता है। गुण भोग क्रिया ही प्रकृति का निरन्तर प्रयोग है। वास्तविकता यह है कि प्रकृति खुद ही भोग उत्पन्न करती है और फिर स्वयं ही स्वयं से भोगी जाती है। जो ज्ञानी इस तथ्य को वस्तुतः जान लेता है वह विरक्त रहता है। उसकी सुर्ति अपने आप में समा जाती है। ध्यान, अभ्यास द्वारा वह मोक्ष की प्राप्ति करता है। अज्ञानी जीव आसक्ति के कारण कर्म बन्धन में पड़ता है तथा प्रकृति उसे नचाती है, और नाना दुःख देती है। प्रकृति के दो रूप परा और अपरा जीवों पर अपना चक्कर चलाते हैं। अपरा में रमण करने से भव बन्धन होता है तथा परा से मोक्ष मिलता है।

संसार के जितने भी कर्म हैं आसक्ति होने से बन्धन का कारण हैं। बुरे कर्मों से नरक तथा दुःख मिलता है, शुभ कार्यों से स्वर्ग मिलता है। तप, तीर्थ, व्रत, कीर्तन, दान आदि सब कर्मकाण्ड स्वर्ग के लिए हैं। इनसे सुखदायक भोग प्राप्त होते हैं। यज्ञ करने से देवत्व मिलता है लेकिन पुण्यः होते ही जीव इस मृतलोक में आ भटकता है। इसीलिए जीव को चाहिये कि अच्छे बरे कमों से विरक्त रहकर कर्म तथा कर्मफल परमात्मा अर्पित कर देवे । ध्यान रखना चाहिये कि भक्ति के बिना कोई योग दि की साधना नहीं होती और बिना समर्पण के भक्ति नहीं होती, समर्पण दिन निष्काम कर्म नहीं होता और निष्काम कर्म बिना वैराग्य विवेक नहीं होता। जानी वैराग्य विवेक में जीता है तथा सहज ही भवसागार से पार हो जाता है।

आत्मा हमेशा ही मुक्त है। वह कभी भी कर्त्ता नहीं होती। उस आत्मा में हु.७. सुख, धर्म, अधर्म का बीज भी नहीं है। बन्धन तथा मोक्ष मन के ही विषय हैं। जिस बिन्दु पर जगत की दार्शनिकता समाप्त होती है वहीं से आगे सान्या का पथ आरम्भ होता है। योगी वैराग्य विवेक द्वारा विषयों की आसक्ति त्यागकर, साधनारत होवे तथा ज्योति स्वरूप का निज में ही दर्शन करें। मैं ब्रह्म हूँ, ऐसा जान लेने पर ब्रह्म भाव में रमण करने वाला योगी किसी भी प्रकार के कर्म से लिप्त नहीं होता। वह विदेह कहलाता है। उसे ब्रह्म ही समझना चाहिये।

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