संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

अमर वचनामृत

1. परमात्मा का दर्शन बाहरी आँख से नहीं होता। उसे तो दिव्य नेत्रों से देखा जाता है। दिव्य नेत्र पढने सुनने से नहीं खुलता। गुरु कृपा के बिना नात्मक शब्द और तीसरी आँख नहीं खुलती ।
2. लोग केवल व्रत रखने, ग्रन्थों का पाठ करने, नदियों में स्नान करने, तीर्थ यात्रा करने, वर्णनात्मक नाम जपने या हाथों से माला फेरने को ही मुक्ति का साधन मानते हैं। उनका यह विचार मोक्ष पथ के लिए बिल्कुल गलत है। मोक्ष आत्मज्ञान से मिलता है और आत्मज्ञान अन्तर की कमाई करने से होता है। इसलिए पूर्ण गुरु की तलाश करो, उससे सतनाम स्था उसके अन्तरजाप की विधि पूछकर अभ्यास करों, तभी काम बनेगा । बाहरी नाम से कोई मतलब हल नहीं होगा। कबीर जी कहते हैं-

कोटि नाम संसार में, ताते मुक्ति न होय।
आदि नाम जो गुप्त है, पूछे बिरला कोय।।
राम राम सब कोई कहे, नाम न चीने कोय।
नाम चिन्हें हरि मिले, नाम कहावे सोय।।

3. लोग अनेकों देवी देवताओं की पूजा में लगे रहते हैं लेकिन इससे परमार्थ सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त नहीं होती। मोक्ष तो केवल आत्मराम (ब्रह्म) के सतनाम से ही मिलता है। इस बारे में गुरुवाणी कहती है-

एको सिमरो नानका, जल थल रहा समाय।
दूजा काहे सिमरिये, जामे और मर जाये ||

कबीर जी कहते हैं-

एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।
जो तू सींचे मूल को, फले फूले अघाय॥
कबिरा जो एक न जाणियाँ तब सब जानें क्या होय।
एक ही ते सब होत है, सब ते एक न होय ॥

4. कुछ लोग कहते हैं. देवी देवताओं में भी परमात्मा है। बात तो ठीक है, लेकिन वह परमात्मा मिलता अपने घट के अन्दर से ही है। चाहर से कभी किसी को नहीं मिला। इसलिए महापुरूष जिन्होंने उसे पाया है. कहते हैं-

आपा पूजो, आपा बन्दो, आपा ध्याओ।
बापू (परमात्मा) आपमें आप होकर रहता है।

5. लोग अपने इष्ट की पूजा कर उससे अपने स्वार्थ की सांसारिक चीजें माँगते रहते हैं, यह सच्ची उपासना नहीं है। सच्ची भक्ति तो निष्काम भाव से होती है जो आत्मज्ञान (मोक्ष) को देने वाली है।
6. भगवान श्री कृष्ण चन्द्र ने अर्जुन को जब विराट रूप दिखाया तो उस विराट रूप में अनेकों ब्रह्मा, विष्णु, महेश दिखाई दिये। जप जी साहब पौड़ी 35 में लिखा है-

केते पवन पाणी वसन्तर, केते कानहा महेश।
केते ब्रहमें घाड़त घड़ी, रूप रंग के वेश॥

तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता अनेक हैं, इसलिये यह परमात्मा नहीं हो सकते क्योंकि परमात्मा एक ही है।

   7. ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म का आचरण, लेकिन लोग वीर्य संचित करने को ही ब्रह्मचर्य समझते हैं। वास्तव में ब्रह्म विद्या का गुरु से सीखना तथा उसके अनुरूप आचरण करना ही ब्रह्मचर्य है। ऐसे आचरण से ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है।

   8. संकल्प रूप में चौरासी लाख योनियों के बीज मानव देह में ही होते हैं और इस मानव देह में ही चौरासी काटी जाती है। साधकों को अहम् भाव त्याग कर गुरु आज्ञानुसार साधना करनी चाहिये। यह अहम् भाव ही चौरासी के चक्कर का कारण है।

   9. भगवान रामचन्द्र जी लक्ष्मण को उपदेश देते हुए रामायण में कहते है-

धरम ते वृत्ति योग ते जाना, ज्ञान मोक्ष प्रव वेद बखाना ।

दान आदि देने, गृहस्थ पोषण करने आदि को ही लोग धर्म समझते हैं बिना वैराग्य विवेक के ये धर्म अर्थहीन हैं। वैराग्य, विवेक ब्रह्मनिष्ठ सौख कर इसके अनुसार कर्म करना ही वास्तविक धर्म है।

    10. मरते समय मन में जैसे संकल्प होते हैं उसी के अनुसार दूसरी योनि है। इसीलिये कहा है- “अंत मता सोई गता” । यदि मन में संकल्प रहो तो मोक्ष मिलता है। मरते समय कोई संकल्प (इच्छा) मन में न रहे लिये जीवन काल में ही संकल्प विकल्प रहित निष्काम भाव से घोषन जीने का अभ्यास करना पड़ता है।

    11. मरते समय मरने वाले को दीपक दिखाते हैं ताकि उसकी गति हो जाये। वास्तविकता यह है कि यह उपदेश मरने वाले के लिये नहीं बल्कि डोंबित लोगों के लिये है कि घट के अन्दर से ज्योति प्रगट करो जिससे वासना रूपी अन्धकार का नाश हो जायेगा और तभी मोक्ष होगा।

    12. सांसारिक हवन यज्ञ, कर्मकाण्डी पुण्यकर्म होने से केवल देवलोक की प्राप्ति कराता है, असली तो योग-यज्ञ ही है जो मुक्ति का दाता है। योग-यज्ञ में विषय वासना की आहुति डालकर उन्हें दग्ध कर देते हैं। जब विषय वासना खत्म हो जाती है तब ही आत्म साक्षात्कार होता है।

    13. आसक्ति भावना का त्याग ही सच्चा त्याग तथा वैराग्य है। आसक्ति त्याग के बाद चाहे घर में रहो, चाहे जंगल में रहो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

    14. जब सेवक अपना तन-मन-धन गुरु को अर्पण कर देता है तो फिर इच्छा कैसी? यदि अपनी भलाई की इच्छा सेवक के मन में उठती है, तो इससे सिद्ध होता है कि उसने ठीक से समर्पण नहीं किया।

    15. कोई भी प्राणी कर्म के बिना नहीं रह सकता। कर्म करना ही पड़ता है। लेकिन जो काम विवेक, वैराग्य, निष्काम भाव से किये जाते हैं वही असली कर्म है क्योंकि वे बन्धन का कारण नहीं बनते। ज्ञान और कर्म दोनों का मिलाप ही श्रेयस्कर है। खाली वेदान्त की बात करने से काम नहीं चलता।

  16. सच्चा सतसंग वही है जो अन्दर की सत्य वस्तु से हमारा मिलाप करा दे।

  17. जो लोग गुरु की कुछ व्यावहारिक क्रिया को देखकर यह समझने लगते हैं कि गुरु पथ-भ्रष्ट हो गया है, वे अज्ञानी हैं। सोना चाहे कूड़े के ढेर में पड़ा हो या साफ सुथरी जगह सजा कर रखा हो उसके मूल्य में कोई फर्क नहीं पड़ता । दम्भी और आडम्बरी गुरु चाहे कितना भी कुछ करें, पारखी उसका मूल्य पीतल के समान ही आंकता है, क्योंकि सोने जैसा रंग होने से पीतल सोना नहीं हो सकता ।

  18. मानवमात्र को सात्विक तथा सुपाच्य आहार और वह भी उचित मात्रा में करना ही श्रेयस्कर है। इसके विपरीत आहार से तामसी बुद्धि उत्पन्न होती है जो मनुष्य को राक्षस व पशु बना देती है। कहा है-

करतूत पशु की मानस जात।
लोक पचारा करे दिन रात ।। 

  19. बनावटी, दम्भी महात्माओं के चरणों में भी माया को नाक रगड़ते देखा गया है। यदि सच्चा और पूर्ण संत महात्मा हो तो दुनिया की कोई सम्पदा ऐसी नहीं जो उनके चरणों से दूर रह सके ।

  20. जिस प्रकार सूर्य, हवा, पानी, अग्नि, आकाश आदि सभी को समान रूप से लाभ देते हैं वैसे ही सतनाम भी स्त्री पुरूष, तथा ऊँच नीच जाति का भेद किये बिना मानव मात्र को आत्मज्ञान कराता है। गुरु ग्रन्थ साहब में लिखा है-

बीज मन्त्र सर्व को ज्ञान, चहुँ वर्णा में जपै कोई नाम।
जो-जो जपै ताकि गत होय, साधु संग पावै जन कोय ।।

  21. विधिपूर्वक सतनाम सिमरन करना चाहिये । इसी एक काम से परमार्थ सिद्धि हो जायेगी ।

गुरुवाणी में कहा है-

नानक लेख इक गल, हौर होमे झखन झाख ।

गुरुवाणी में कहा है-

एक नुख्ने में सब इल्मों का मतलब पा लिया,
फिर कागज का बोझा सिर पर उठाना क्या जरूर।

मतलब साफ है कि विधिपूर्वक एक नाम सिमरन से जब आत्म ज्ञान हो जाता है तो सारी दुनिया का ज्ञान और सारी दुनिया के ज्ञान से आगे जो ज्ञान देवह भी अन्दर से प्रगट होता है। इसीलिए कबीर ने कहा है-

वेद हमारा भेद है, हम वेदन के माहि।
जो कुछ हम करत हैं, वह वेदों में नाहि।।

जीभ से सतनाम का स्मरण मन को एकाग्र नहीं कर सकता। इसलिए गुरु से विधि सीखकर मन से धुनात्मक सिमरन करना चाहिये । गुरुवाणी में लिखा है.

किरतम नाम जपै तेरी जिव्हा
सतनाम तेरी परा परबला ।।

तात्पर्य यह है कि सतनाम परावाणी से जपा जाता है जिसका स्थान नाभि मेंहै।

    कबीर जी ने भी कहा है:-

नाभि सेति उठति है,
फिर ताहि माहि समाय ॥

जब योगी को अन्तर में रस, आनन्द मिलने लगे तो मन को उसमें एकमएक कर दे। परमात्मा का एहसान माने। जब कभी आनंद न आये तो घबरा कर अभ्यास छोड़े नहीं । दृढ़तापूर्वक अभ्यास करता रहे। यह आँख मिचौनी का सा खेल होता है। कभी आनन्द आता है और कभी छिप जाता है. फिर आता है। मन को आनन्द में लीन रखे, धुन की ओर ज्यादा ध्यान न देवे वरना मन फैलाव में आ जाता है। चंचल तथा विचार रत होकर सख्याल को दुनिया की ओर ले जाता है जिसके कारण परमात्मा से दूरी बढ़ जाती है। कोई शंका या बाधा होने पर फौरन गुरु से मिले तथा समाधान पूछ, जल्दी कार्यवाही करे। जब अभ्यास ठीक से चल रहा हो तो ज्यादा जल्दी न करें। मालिक की रजा में राजी रहे । हठ करना ठीक नहीं क्योंकि कभी-कभी हठ से हानि हो जाती है। अभ्यास पक जाने पर मन चौबीसों घण्टे घट में उठ रहे शब्द में समा जाता है और योगी खुद ही शब्दमय हो जाता है। फिर बगैर किसी साधन के ही आनन्द में मग्न रहने लगता है।

  24. परमात्मा को दीनदयाल कहा जाता है क्योंकि वह दीनों पर शीघ्र तथा अति कृपा करता है। इसलिये योगी को दीनता धारण करना बहुत जरूरी है। जो दीन होकर एक कदम परमात्मा की तरफ बढ़ाता है, परमात्मा उसकी तरफ सौ गुणी दया करता है।

  25. योगी को खुशहाल सज्जनों से मित्रता, दुःखी सज्जनों पर दया तथा दुष्टों से दूरी रखकर, अपने सुख-दुख, लाभ-हानि में समभाव हो, अन्तरकमाई में लगे रहना चाहिये।

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