संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

चमत्कार क्या है?

धारणा, ध्यान, समाधि तीनों मिलकर संयम कहलाते हैं। ये सभी सबीज समाधि के अन्तरंग साधन हैं किन्तु निर्बीज समाधि के लिए ये साधन भी बहिरंग ही हैं। इनके संयम विनियोग से कई प्रकार की शक्तियाँ (ऋद्धि सिद्धि) प्राप्त हो जाती हैं। ये सिद्धियाँ यद्यपि अश्रद्धालु लोगों की योग में श्रद्धा बढाने और विक्षिप्त चित्त वालों के मन को एकाग्र करने में सहायक होती हैं किन्तु इनमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये वरना ये महापतन का कारण बन जाती हैं। इसीलिए सभी संत महात्माओं ने इन सिद्धियों का दुरुपयोग न करने का उपदेश दिया है। योगशास्त्र के विभूतिपाद में भी चेतावनी दी गई है कि योगी को नाना प्रकार के प्रलोभन आते हैं, योगी को उनसे बचना चाहिये। उनमें फँसने से और घमंड से बचे रहना चाहिये। इन सिद्धियों से भी वैराग्य होने पर तथा सभी दोषों का बीज क्षय होने पर ही मोक्ष मिलता है।

ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः
स्थान्युपनिमन्त्रणे संगस्मयाकरणं पुनरनिष्ट प्रसंगात
सत्तव पुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं-सर्वज्ञा तृत्वं च ।।
तद्वैराग्यादपि दोष बीजक्षये कैवल्यम्।

योगी के नित्य जीवनचर्या के कार्य करने में ही कभी-कभी ये शक्तियाँ चमत्कार कर देती हैं, जब कि योगी इनसे अनासक्त ही रहता है। संत महात्मा चमत्कार दिखा कर संसारी लोगों को प्रभावित करने के लिये ऋद्धि-सिद्धियों का प्रयोग नहीं करते। वे तो सहज स्वभाव में रहते हैं। करुणा से या लीला-वश उनके द्वारा चमत्कार स्वतः ही हो जाते हैं। यह जरूरी नहीं है कि किसी एक का कोई कष्ट चमत्कारी रूप से दूर कर दिया तो उसी प्रकार का कष्ट अन्य सभी लोगों का दूर कर दिया जाये । यह तो भक्त की भावना तथा महापुरुषों की करुणा पर निर्भर करता है। यदि भक्त की भावना महापुरुषों को प्रसन्न कर उनमें करुणा पैदा कर दे तो उन पर भी वैसा ही चमत्कार हो सकता है।

इस नियमानुसार इस आश्रम में ऐसे चमत्कार होते ही रहते हैं। सर्वाइकल स्पौंडिलाइटिस में चक्कर आना, तीव्र पीड़ा होना, गर्दन का न हिलना आदि शिकायतें, अधरंग में मुँह का टेढ़ा होना, आवाज साफ न निकलना या बिल्कुल न निकलना, मुँह से पानी निकल जाना, खाना गले में अटकना, लार गिरते रहना आदि समस्या, फ्रोजन शोल्डर में हाथ का ऊपर या पीछे न जाना तथा अन्य प्रकार के दर्द यहाँ तुरन्त ही ठीक हो जाते हैं। कभी-कभी संसार में कहीं से भी रोगी से टेलीफोन पर बात होने या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा रोगी के बारे में प्रार्थना करने मात्र से ही दर्द तथा अन्य रोगों में यहीं आश्रम में बैठे-बैठे राहत पहुँचा दी जाती है।

सत्यपाल profile picture
सत्यपाल
मकान नं0-एच 2 डी. ई. एस. यू० कॉलोनी त्रिफेलिया-प्रतापबाग दिल्ली
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मैंने 1979 में मोतिया के लिए दोनों आँखों का ऑपरेशन कराया था। जनवरी 1993 में मैं देखने में बिल्कुल असमर्थ हो गया। आँखों के डाक्टर से मैंने इलाज कराया, मगर कोई आराम न आया। जब डॉक्टर ने मेरी आँखों पर 24 नम्बर का चश्मा लगाया, तो थोड़ा बहुत मुझे दिखने लगा। 10 जुलाई 1994 को जब मैं ओऽम् नारायण मन्दिर ढक्का में कर्नल अमर सिंह जी से मिला, तो उन्होंने मुझे बूढ़पुर आश्रम में सप्ताह में दो बार आने को कहा। महाराज अमर सिंहजी (गुरुजी) ने मेरी आँखों पर हाथ लगाया, तो मेरी आँखों की रोशनी बढ़ती गई। 30 जुलाई को मैंने फिर डॉक्टर से जाँच कराई, तो दाहिनी आँख बिल्कुल ठीक हो गई तथा रोशनी 6/6 निकली । बाँई आँख पर केवल तीन नम्बर का चश्मा लगाने को डॉक्टर ने कहा। मगर महाराज जी ने बोला, 'अभी चश्मा मत लगाओ शायद यह भी बिल्कुल ठीक हो जाए।' उसके बाद मैंने चेक तो नहीं कराया, मगर मैं अपने आपको ठीक महसूस करता हूँ।
अजय पुत्र राम अवतार अरोड़ा-नीलवाले profile picture
अजय पुत्र राम अवतार अरोड़ा-नीलवाले
151 गोपाल पार्क, देहली-51.
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मेरी दोनों आँखों की रोशनी चली गई। एक आँख का दो बार तथा दूसरी आँख का तीन बार आई (EYE) अस्पताल, सीतापुर में ऑपरेशन हुआ, मगर कोई आराम न आया। जब मेरे पिता मुझे महाराज अमर सिंह जी के पास लेकर आये तो मुझे सूर्य भी दिखाई नहीं देता था। गुरुजी ने मेरी आँखों पर हाथ फेरा। तीन दिन बाद मैं बल्ब की रोशनी देखने लगा। दस दिन बाद मैंने पशु, स्कूटर और आदमी को देखकर कहा कि मुझे पशु या आदमी की परछाई सी लगती है। हाथ को हिलता देखकर कहा कि हाथ ऊपर से नीचे या दायें बायें हिल रहा है। 20 दिन बाद मुझे साफ तो दिखाई नहीं देता था मगर सामने जो चीज आती उसे देखकर कहता कि आगे कुछ है और मैं अपना बचाव कर लेता । कहीं जाना होता तो अपने आप चला जाता। अब दूसरे आदमी के सहारे की जरूरत खत्म हो गई है। इसके बाद मुझे किसी कारण से अलमोड़ा जाना पड़ गया और मैं इलाज के लिए न आ सका। मैं उनके आशीर्वाद से इतना तो देख पाता हूँ कि दूसरे आदमी का सहारा लिये बिना थोड़ा बहुत चल फिर लेता हूँ।
श्री मांगेराम profile picture
श्री मांगेराम
मकान नं0 93, पंजाबी कॉलोनी, नरेला-दिल्ली
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मेरी बेटी सीमा आयु 8 वर्ष, जब वह 6 वर्ष की थी, तब एक दिन उसे अचानक दिखाई देना बंद हो गया। डॉक्टरों ने जाँच करके बताया कि आँखें तो ठीक हैं मगर देखने वाली (आपटिक नर्व) मर गई हैं। अब इसका कोई इलाज नहीं है। कई जगह दिखाया, सभी ने यही जवाब दिया। आल इण्डिया मेडिकल इन्सटीट्यूट के डॉक्टरों ने भी कहा कि उसे पूरा जीवन अन्धे रहकर ही बिताना होगा। मेरे एक मित्र ने मुझे संत श्रद्धाराम आश्रम में ले जाने की सलाह दी। वहाँ गुरुजी (कर्नल अमर सिंह जी) ने मेरी बेटी की आँखों पर तीन बार हाथ लगाया और वह देखने लग गई। यह एक चमत्कार ही था। वहाँ बैठे साठ-सत्तर आदमियों ने मिलकर जोर से बापू जी की जय बोली। गुरुजी ने मुझे तीन बार मन्दिर में अपनी बेटी का मत्था टिकाने के लिए कहा। अब वह बिल्कुल ठीक है।
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