संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

ज्ञानयोग

ज्ञान चार प्रकार का होता है-श्रवण, मनन, निधिध्यासन और साक्षात् । यह कनिष्ठ पुरूषों में पाया जाता है। जब तब
1. श्रवण ज्ञान – महापुरूषों के वचन, सतसंग आदि सुनता रहता है तब तक ज्ञान चमकता रहता है और जब सतसंग प्रवचन खत्म हो जाता है तो यह ज्ञान भी लुप्त हो जाता है। ऐसे ज्ञान को श्रवण ज्ञान कहते हैं। यह बाह्यग्नि वत् काम करता है अर्थात् जब तक लकडी. ईंधन डालते रहो, आग जलती रहती है।
2. मननज्ञान – महापुरुषों से सुना या ग्रन्थों से पढ़ा ज्ञान कभी-कभी चमक जाता है। जैसे किसी की मौत हो जाने पर या किसी और प्रकार का कष्ट आ जाने पर जो वैराग्य या ज्ञान थोड़े समय के लिए दिखाई देकर मन में संचित हो जाता है और बाहरी तौर पर भूल जाता है, उसे मनन ज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान मध्यम पुरुषों में पाया जाता है। यह मेघाग्नि (बिजली) की तरह से काम करता है।
3. निधिध्यासन ज्ञान – यह ज्ञान उत्तम पुरुष में होता है। उत्तम पुरुष संसार में रहते हुए भी संसार के विषयों से प्रभावित नहीं होता। वो ज्ञान मनन द्वारा मन में संचित था, उस ज्ञान वैराग्य का लगातार दबाव सा बना रहता है तथा वह संसार के विषयों भोगों को शान्त करता है। विषय भोग इस तीव्र ज्ञान को शान्त नहीं कर सकते। यह बड़वानल (समुद्र में रहने वाली अग्नि) के समान काम करता है।
4. साक्षात् ज्ञान – साक्षात् ज्ञान सभी संकल्पों विषयों-वासनाओं क्लेशों तथा भ्रमों का नाश यह आत्मदर्शी संत महात्माओं में होता है। कर देता है और यह ज्ञान संसार के किसी भी विषय से लेशमात्र भी प्रभावित नहीं होता है। ऐसे पुरुष संसार में जीवन मुक्त होकर विचरते हैं। यह ज्ञान महाप्रलय अग्नि के समान काम करता है।

जिज्ञास् को चाहिये कि इन अवस्थाओं के अनुसार अपनी जाँच करता रहे और आगे बढ़ता रहे। याद रहे कि श्रवण, मनन, निधिध्यासन, साक्षात् ज्ञान क्रमशः एक के बाद एक होते हैं। इस प्रकार अभ्यास करते रहने से एक दिन अवश्य ही साक्षात्कार हो जायेगा। मन्द जिज्ञासी लोग श्रवण ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान समझते हैं और दुःख सुखादि में एक कहावत है कि पुत्र के बिना मुक्ति नहीं होती। असल में यह बात भटकते रहते हैं।
ज्ञान रूपी पुत्र के लिए है न कि देहधारी पुत्र के लिए। यदि देहधारी पुत्र के लिए होती तो 99% (निन्यानबे प्रतिशत) गृहस्थ लोगों की मुक्ति स्वतः ही जाती। ब्रह्मचारी रहकर जो लोग संन्यास लेकर उच्चकोटि के महात्मा बने है उनकी गति कैसे होगी? हमें ऐसे महात्माओं के उपदेश सुनने की, मन्दिर, मस्जिद गुरुद्वारे आदि धर्म स्थानों में जाने की क्या जरूरत पडती? बस पुत्र पैदा करके ही मुक्ति हो जाती? लेकिन ऐसा नहीं है। वास्तव में ज्ञान रूपी पुत्र ही मुक्ति दिलाता है और इसे प्राप्त करने के लिए श्रवण, मनन, निधिध्यासन का अभ्यास करो ताकि साक्षात् ज्ञान रूपी पुत्र मिल जावे।
इस बात का ध्यान रखना कि गुरु रूपी पति और सेवक रूपी पत्नी से ही ज्ञानरूपी पुत्र का जन्म होगा। यदि पत्नी बाँझ हो तो भी और नपुंसक पति हो तो भी या दोनों ठीक होते हुए भी मिलन न करें तो भी पुत्र की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए गुरु पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ तथा शिष्य पूर्ण समर्पित जिज्ञासु हो और वे अमल भी करें तो फिर यह निश्चित ही है कि ज्ञान रूपी पुत्र मिलेगा। 

गुरुवाणी कहती है –

भक्ति हीन काहे जग आया।
पूरे गुरु की सेवा न कीनि विरथा जनम गवाया।
कुम्भै बद्धा जल रहे जल बिन कुम्भ न होय ।
ज्ञान का बद्धा मन रहे गुरु बिन ज्ञान न होय ॥

लोग भक्ति तो करते नहीं और ज्ञान प्राप्त करना चाहतें हैं जो असम्भव है।

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