संत श्रद्धाराम आत्म-बोध साधना आश्रम

ब्रह्मपथ (अंतर यात्रा)

श्रद्धाराम पूर्ण बहा, किया ऐसा उपदेश
जा करते. पय मोक्ष मिले, मिटते सर्व क्लेश ॥
परमार्थ हिय धारकर सोच जन कल्याण |
ब्रह्म विद्या और अन्तर राह का सतगुरु दिया दान ॥
जैसी सीख सतगुरु वई, वैसी देखी कर ध्यान ।
सत्य सदा ही सत्य है, न संशयमई अनुमान ॥
जैसी की तैसी कहूँ, जैसों विधि विधान |
करणें अमर सिंह, घटत बढ़त रहित, सच्चा गुरु का ज्ञान ॥

शरीर में बहत्तर हजार नाडियाँ हैं जिनमें तीन मुख्य हैं-इड़ा, पिंगला और तुम्ना। प्राण प्रवाह इडा में वाम पथ से पिंगला में दक्षिण पथ से तथा सुषुम्ना में मध्य पथ से होता है। प्राण के सुषुम्ना में प्रवेश बिना शक्ति जागृत नहीं होती। सुषुम्ना का बड़ा महत्व है क्योंकि यह काल नाशक है। या मूलाधार चक्र से कपाल की ओर गई है। इसके नीचे कुण्डलिनी पद्म है जिससे साढ़े तीन लपटे देकर लिपटी, अद्याशक्ति सुषुप्त अवस्था में पड़ी है। इस शक्ति के जागरण से सूर्य के समान अद्भुत ज्योति प्रगट होती है। सुषुम्ना के अन्दर बज्रा, बज्रा के अन्दर चित्रणी, चित्रणी के अन्दर ब्रह्म नाड़ी है। इसी में सुर्ति चढ़ती है। ज्यों-ज्यों ब्रह्म नाड़ी में सुर्ति ऊपर चढ़ती है, त्या-त्यों मलावरण साफ होते जाते हैं। मनुष्य के पाप समूह सुषुम्ना में प्रविष्ट होते हैं जिससे अद्याशक्ति को रोक लगती है परन्तु प्राणों के संयम से या अद्याशक्ति सुषुम्ना को शुद्ध करती हुई आगे बढ़ती है और सुर्ति ऊपर बढ़ती जाती है। इससे चित्त के संस्कार जलते हैं और योग शक्ति का स्रोत बढ़ता है। जब योगी के ध्यान की उत्तम गति हो जाती है तब अनगिनत शक्तियाँ प्रगट होती हैं तथा देवताओं के दर्शन होने लगते हैं जिन्हें देखकर योगी बड़ा प्रसन्न होता है। ये देवता तरह-तरह के प्रलोभन देकर योगी का ध्यान डिगाना चाहते हैं। उनके भ्रम जाल में न आना चाहिये तथा दृढतापूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढते रहना चाहिये। देवताओं के व्यवहार स्तुति, प्रशंसा से तथा ऋद्धि-सिद्धियों से अभिमान आ जाने का भय रहता है। इसे घातक तथा समाधि में विघ्न समझ कर सतर्क रहना चाहिये

   पग-पग पर योगी को विरोधी लोगों से पाला पड़ता है जो हर समय योगी । की निन्दा करते रहते हैं। यहाँ योगी को कोध न करना चाहिये संयम रखना चाहिये तथा नीचे लिखी बातों को ध्यान में रखना चाहिये। 

    1. निन्दक साधु का हितैषी होता है क्योंकि वह साधु के सब दोषों को एक-एक करके खोजता है और उन दोषों को खुद ही खा जाता है तथा संत का पुण्य भण्डार सुरक्षित बना रहता है।
    2. साधु का निन्दक योगी के दोषों को अपने ऊपर लेकर खुद नर्क में जाता है और साधु को श्रेष्ठ बनाता है।
    3. साधु का निन्दक रात दिन अपना दाँव खेलता रहता है परन्तु ईश्वर सबके हृदय के भावों को समझता है ऐसा सोचकर योगी को लक्ष्य की ओर बढ़ते जाना चाहिये ।
    4. जैसे जिह्वा दाँतों के बीच घिरी रहने पर भी सतर्कता पूर्वक अपने को सुरक्षित रखती है वैसे ही योगी को भी अहंकार, प्रलोभन तथा मान-अपमान से सतर्क रहना चाहिये तथा गुरु आज्ञानुसार निर्भय परमार्थ में अग्रसर रहना चाहिये।

दिव्य नेत्र खुल जाने के बाद योगी को काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि में फंसने का कोई खतरा नहीं रहता । साधक को ध्यान अवस्था में बड़े अनोखे दृश्य जान पड़ते हैं। योगी कोहरा, धुआ, चाँद, सूरज, अग्नि प्रकाश के तिरमिरे, बिजली की चमक तथा बादल की गरज आदि अनेकों दृश्यों का आनन्द लेता है। पाँच तत्वों से ऊपर उठकर अनेकों सिद्धियों को प्राप्त करता है।
सुर्ति जब गगन मंडल में चढती है तो उस यात्रा में नाना ज्ञान चक्र तथा दिव्य स्थानों के दर्शन होते हैं जिनका चार भागों में वर्णन किया जाता है-पिण्डदेश के स्थान, अण्डदेश के स्थान, ब्रह्माण्ड देश के स्थान तथा सचखण्ड देश के स्थान।

पिण्डदेश के स्थान-मूलाधार से आज्ञाचक्र तक छह ज्ञान चक्र हैं । यह सब स्थूल शरीर की परिधि में आते हैं। अध्यात्म के साथ-साथ इनका शारीरिक महत्व भी बडा है। यह चक्र अलग-अलग शरीर के अंगों को चेतना देकर कार्य करने में सक्षम बनाते है।
   1. मूलाधार चक्र-यह गुदा के पास है। चार दल का बना लाल रंग का कमल है। इसका देवता गणेश है तथा यहाँ कई मनोहर सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
   2. स्वाधिष्ठान चक्र-यह मूलाधार से चार उंगल उपर छः दल का कमल है। इसका प्रकाश सुनहरे रंग का है। यहाँ का देवता ब्रह्मा है।
   3. मणिपुर या नाभि चक्र-यह दस दल का कमल नीलवर्ण का है। यहाँ का देवता विष्णु है।
   4. अनाहत चक्र-यह हृदय स्थान में है। यह कमल बारह दल का है। यहाँ का देवता शिव है। इसका रंग सफेद है।
   5. विशुद्धि चक्र-इसका स्थान कंठ है। यह सोलह दल का कमल है जिसका रंग चन्द्रमा जैसा है । यहाँ का देवता शक्ति को माना गया है । इस धाम का अनूठापन योगी को अचम्भित कर देता है।
  6. आज्ञाचक्र-इसका स्थान आँखों की भौंहों में है। यह दो दल का बना है। यहाँ पाँचों तत्वों के भिन्न-भिन्न रंग दिखाई देते हैं। यहाँ का देवता ज्योति निरंजन है । इसकी एक पंखुड़ी काली और एक सफेद है। 

हठयोगी इन छह चक्रों को हठयोग की क्रियाओं से तोड़ते हैं मगर सहजयोग में ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सहज योग की शुरूआत तीसरे तिल से होती है जिससे नीचे के छह चक्रों का भेदन स्वतः ही हो जाता है। संत तुलसी दास हाथरसी घटरामायण के रचयिता कहते हैं

पहले जुग में योग कुमावे ।
मूलाधार से ध्यान लगावे ॥
अब यह रीति दीनि छोड़ी ।
ऊपर-ऊपर सुर्ति मोड़ी ॥
सहज योग की करूँ बढ़ाई ।
तीसरे तिल से करो चढ़ाई ।

अण्डदेश

7. सहस्त्रदल-(बैकुन्ठ) इसकी गणना अण्डदेश में की है। यह लिंग देह का स्थान है। यहीं से ब्रह्माण्डी देशों का द्वार खुलता है। यह तालू स्थान के ऊपर है तथा महाशक्तियों का केन्द्र है। छह चक्रों के बाद सहस्त्रदल सीमा पर तीसरा नेत्र है। उसके बाद झंझरी द्वीप है जहाँ स्वर्ग नर्क का फैसला होता है। फिर सुर्ति शब्द में लीन हो जाती है और दिव्यनेत्र खुल जाता है। फिर सुर्ति वायु वेग से गतिमान होती है और त्रिकुटी की ओर बढ़ती है। सहस्त्रदल में मन इच्छायें त्याग देता है तथा वैरागी बन जाता है। यहीं पर शब्द तथा ज्योत प्रगट होकर स्थिर होती है। यहीं तक मृत लोक की याद स्थूल रहती है।

ब्रह्माण्ड देश

8. त्रिकुटी-इड़ा, पिंगला, सुष्मना नाड़ियों का तीन दल का बड़ा ही मनोहर संगम स्थान है। यहाँ पर घण्टे आदि नादों की आवाजें गूंजती है । यह सूक्ष्म देह का निवास है। यही ओंकार का स्थान है। त्रिकूटी में त्रिगुणी माया व्याप्त है। इस माया जाल से बचाने के लिए त्रिकूटी में प्रवेश से पहले बंकनाल में गुरुदेव दर्शन देकर अंग संग हो जाते हैं फिर सुर्ति सुन्न लोक में जाती है। त्रिकूटी में मुत्युलोक की याद स्वप्न समान रह जाती है तथा मन निर्मल हो जाता है। यज्ञ, तप, व्रत, देव पूजा तथा अन्य कर्म-काण्डों के फल यहीं तक हैं।

9. सुन्नलोक– (दशमद्वार) यह एक दल का बहुत अद्भुत तथा बड़े विशाल विस्तार वाला है। यहाँ की सृष्टि बड़ी सुखदायी है। इसे देवलोक का स्वर्ग कहते हैं। यहाँ के देवी देवता योगी को प्रलोभन देकर उसके लक्ष्य से भटका देते हैं। योगी को दृढ़ वैराग्य के साथ आगे बढ़ते जाना चाहिये क्योंकि यहाँ के सुख भी सीमित ही हैं। पुण्य खत्म होने पर फिर मृत लोक में आना पड़ता है। सुन्न तथा महा सुन्न लोकों में कारण देह का निवास है। मृतलोक की यादें अति सूक्ष्म हो जाती हैं। यहाँ अलग-अलग देवताओं के लोक हैं।

  10. महासुन्न लोक-यह अंधेरी घाटी है जहाँ पर बड़ा भ्रम तथा घबराहट होती है। कोई रास्ता भी नजर नहीं आता। यहाँ की रचना जीव रहित है। इसके बाद सुर्ति भँवर गुफा में जाती है। यहाँ मृत लोक की यादें खत्म हो जाती हैं।

  11. भँवर गुफा-यहाँ पर अगणित द्वीपों का नजारा देखने को मिलता है। यहाँ की माया, जीव, प्रकृति युक्त है । यहाँ पर महाकाल का हुक्म चलता है। कोई बिरला संत ही यहाँ की शोभा का आनन्द लेता है। ललाट के ऊर्ध्वभाग में भँवर गुफा का मुकाम है। इसके बाद सुर्ति सचखण्ड के लोकों में प्रवेश करती है। भँवर गुफा तक ही आवागमन होता है । गुरुमुख रूहें जो निर्वाण यात्रा पर हैं उनको महाकाल नहीं रोकता तथा उनके साथ दया का व्यवहार करता है।

सचखण्ड

  12. सतलोक-यहाँ की सीमा का वारपार नहीं है । यहाँ सतपुरूष विराट का राज्य है। यहाँ पर बिना साजों के धुन बजती है। सुर्ति अनहद नाद में मस्त हो जाती है। मुग्ध करने वाली सुगन्ध हर दिशा में फैली रहती है। करोड़ों सूर्यो का प्रकाश एकत्र होकर भी यहाँ के प्रकाश की बराबरी नहीं कर सकता। हर तरफ जुगनू जैसी टिमटिमाहट यहाँ की शोभा बढ़ा रही है। यहाँ हंस भी बहुतायत में दिखाई पड़ते हैं। सतलोक पहुँचकर जीवात्मा फिर जन्म मरण में नहीं फँसती। यह सतपुरूष विराट ही प्रकृति में स्वयं समाया है, जिससे प्रकृति चेतन होकर संसार की रचना करती है। सभी जीव, दैत्य, देव-ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि तथा सभी लोक-लोकान्तर उसी विराट पुरूष में व्याप्त हैं। विराट का दर्शन होने के बाद आत्मज्ञानी पुरूष का कोई कर्म शेष नहीं रह जाता। संसार में रहते हुए भी कर्म से उसका कोई प्रयोजन नहीं है। वह सब कुछ करता हुआ, कुछ नहीं करता और कुछ न करते हुए भी सब कुछ करता है। भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र ने गुरुरूप धारण कर अर्जुन को इसी विराट पुरूष का साक्षात्कार कराया था।

  13. अलखलोक-यहाँ अलख पुरूष की हुकूमत है। अलख पुरूष का एक रोम इतना विशाल है कि अरबों सूर्य एकत्र होकर भी उससे छोटे पड़ते हैं। ये अलखपुरूष ही हिरण्यगर्भ है जिसमें समस्त चर-अचर सृष्टि, बीज रूप में समाई है। अगम अगोचर लोक भी अलख के ही. अंश हैं। फिर भी अलग भासमान होते हैं।

  14. अगम लोक– यहाँ अनगणित ब्रह्माण्ड हैं। यहाँ पर दुःख लेशमात्र भी नहीं है।
  15. अगोचर लोक– यहाँ केवल आत्मा का ही प्रकाश व्याप्त है और कुछ भी नहीं है।
  16. अनामी लोक इसका अनुभव स्थान चोटी की जगह हैं। इसे ही पूर्ण परब्रह्म कहा जाता है। इसके सिवाय कुछ भी नहीं है। जो कुछ प्रतीत होता है सब उसी की लीला है। परब्रह्म निराकार है। वह देहावतार धारण नहीं करता। जिस घट में उसकी ज्योति प्रगट हो जाती है उसे ही लोग अवतार मानकर पूजने लगते हैं। इसलिए गुरुवाणी में कहा है, “बलहारी वा तान को जा घट प्रगट होय”। संसार उसी का अनुसरण करने लगता है। इसी नियम के आधीन देवता आदि जगत की व्यवस्था करने में समर्थ हो पाते हैं। वह परब्रह्म न स्थूल है, न विभू है, न घटने बढ़ने वाला है। वह अविनाशी सभी विकारों से रहित है तथा केवल ज्योति स्वरूप देखने में आता है। उस पूर्ण ब्रह्म का न तो कोई कारण ही है और न कोई कार्य ही है। जिस प्रकार दूध में घी होता है, उसी प्रकार वह ज्योति स्वरूप, निराकार रूप से सबमें समाया हुआ है। जिस प्रकार नदी अपने बहाव से समुद्र में विलीन हो जाती है उसी प्रकार योगी अपने नाम रूप आदि की आसक्ति छोड़कर ब्रह्म में लीन हो जाता है। जिस प्रकार वर्षा का जल नदी से मिल, समुद्र में पहुँच, अपना नाम समुद्र प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार आत्मा, ब्रह्म में मिल, ब्रह्म बन जाती है।
पूर्ण सतगुरु जो ब्रह्म स्वरूप हैं वे ही सतनाम की दीक्षा देकर (युक्ति बताकर) शिष्य की सुर्ति को गगन मंडलों में चढ़ाते हैं तथा ब्रह्म दर्शन कराके ब्रह्मरूप बनाते हैं। ऐसे सन्त बिरले ही होते हैं।
ऐसे पूर्ण ब्रह्म स्वरूप सतगुरु श्री श्रद्धाराम तथा अन्य सभी ब्रह्मनिष्ठ संतों को अमर सिंह का कोटि-कोटि प्रणाम।

Call Us Now
WhatsApp